Thursday, 5 April 2018

धर्म न बदलो बल्कि इंसान बनो या नास्तिक बनो

दलितों और शूद्रों (ओबीसी) को बौद्ध बन जाने की सलाह पर मजेदार प्रतिक्रियाएं आती हैं. खुद दलित शूद्र या आदिवासी इस सलाह का विरोध नहीं करते क्योंकि उन्हें पता है कि वे किस नर्क में जी रहे हैं और इस नर्क से आजादी का क्या मतलब है.
लेकिन हिन्दुओं और खासकर ब्राह्मण मित्रों और गहन धार्मिक जीवन जीने वाले मित्रों की तरफ से अक्सर सलाह आती है कि सभी धर्म एक से हैं धर्म न बदलो बल्कि इंसान बनो या नास्तिक बनो.
ये सलाह अक्सर अच्छे मन से सौहार्द्रपूर्ण ढंग से करुणा या मित्रता की मुद्रा में ही दी जाती है. लेकिन मैं पूरी विनम्रता और सम्मान के साथ इन सलाहों को नकारता हूँ. अपने दलित शूद्र आदिवासी भाइयों से निवेदन करूंगा की वे इस सलाह में छुपी भूल और षड्यंत्र को समझें और ऐसी सलाह और सलाहकारों से बचकर रहें.
ऐसे सलाहकार मित्र सलाह देते हैं कि धर्म परिवर्तन न करके इसी धर्म और समाज में रहकर इसे बदलो. लेकिन ये असंभव है क्योंकि शूद्रों और दलितों की तरफ से धर्म या समाज में सुधार के किसी भी प्रयास का स्वागत नहीं होगा. क्योंकि दलितों आदिवासियों को हिन्दू माना ही नहीं गया है. अब जिन्हें हिन्दू ही नहीं माना जाता वे हिन्दू धर्म या हिन्दू समाज में कैसे सुधार करेंगे? क्या कोई मुसलमान या पारसी हिन्दू धर्म में सुधार कर सकता है?
क्या कोई हिन्दू इसाई धर्म में सुधार कर सकता है? उसी तरह दलित भी हिन्दू धर्म को नहीं सुधार सकता. वो केवल हिन्दू धर्म को छोड़ सकता है.
इन सलाहों में एक भयानक षड्यंत्र भी छिपा है. ये सलाहकार कहते हैं खालिस इंसान या नास्तिक बन जाओ. ऊपर ऊपर ये अच्छी लगती है. लेकिन इस सलाह में भयानक शातिर षड्यंत्र छिपा है. एक गरीब कौम कभी भी नास्तिक नहीं बन सकती. उसे कोई न कोई महापुरुष शास्त्र या धर्म चाहिए. आप नास्तिकता पर जोर देंगे तो ये गरीब नास्तिक होने का साहस और बुद्धि तो अर्जित नहीं कर पायेंगे लेकिन धर्म के सबसे घटिया रूपों के गुलाम जरुर हो जायेंगे.
साम्यवादी नास्तिकता ने भारत में धेले भर का भी प्रभाव नहीं पैदा किया है. उनकी वजह से लोग नास्तिक तो नहीं बने बल्कि कथाकार और प्रवचनकार बलात्कारी बाबाओं के गुलाम जरुर बनते गये हैैं.
धर्म की बहस को “धर्म अफीम है” कहकर सीधे नकारने से कोई फायदा नहीं होता, उलटा नुक्सान ही होता है. अगर समझदार वर्ग धर्म की बहस से बाहर निकल जाए तो फिर धर्म में मूर्खों और पोंगा पंडितों का ही राज चलता है. इसमें समझदारों की ही गलती है, मूर्ख पोंगा पंडित तो इसका लाभ उठायंगे ही उनकी क्या गलती है, उनका काम ही यही है. आँख खोलकर देखिये भारत में यही हो रहा है.
धर्म को अफीम मानते हुए भी समझदारों को इस अफीम की वादी में घुसकर इसे साफ़ करना होगा. यही बौद्ध धर्म का प्रयास है. यही बुद्ध अंबेडकर और कृष्णमूर्ति की शिक्षा है.
नाले को साफ़ करने के लिए आपको नाले में घुसना होता है.
अफीम के खेत में घुसकर अफीम को साफ़ करने का तरीका बौद्ध धर्म है, कोरा साम्यवादी चिंतन या नास्तिकता इस खेत से पलायन सिखाता है. इस पलायन से ये खेत और ये खेती खत्म नहीं होती बल्कि इसे मिलने वाली चुनौती ही खत्म हो जाती है. हकीकत ये है कि लोगों को धर्म के नुक्सान से अवगत कराये बिना उन्हें मुक्त नहीं किया जा सकता.
वामपंथी चैम्पियन खुद अपने ब्राह्मणी कर्मकांड पूरे विधि विधान से करते हैं. बंगाल और केरल में वामपंथी मित्रों की शादियों और मृत्यु के कर्मकांड देख लीजिये आपको सब समझ में आ जायेगा.
दलितों शूद्रों को खालिस इंसान या नास्तिक बनने की सलाह देने से पहले इस देश के संपन्न वर्ग को नास्तिक बनाकर देखिये, वो कभी नहीं बनेगा. नास्तिकता की सलाह देने वालों के घरों में झांककर देखिये वे सामान्य से भी बड़े कर्मकांडी अन्धविश्वासी और भक्त निकलेंगे.
दलित आदिवासी और शूद्रों को नास्तिक नहीं बल्कि बौद्ध बनना है. ये नोट करके रखिये मित्रों. औपचारिक धर्म परिवर्तन की अभी आवश्यकता नहीं अभी सिर्फ व्यवहार और आचरण में बौद्ध हो जाइए बाद में अनुकूल समय पर विशाल संख्या में परिवर्तन होना ही है. इससे बड़ी कोई क्रान्ति नहीं. भारत को सभ्य बनाने का यही एक तरीका है.

आंबेडकरवाद

आंबेडकरवाद  किसी भी धर्म, जाति या रंगभेद को नहीं मानता, आंबेडकरवाद  मानव को मानव से जोड़ने या मानव को मानव बनाने का नाम है।आंबेडकरवाद  वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर मानव के उत्थान के लिए किये जा रहे आन्दोलन या प्रयासों का नाम है।आंबेडकरवाद  ‘भारतीय संविधान’ तथा ‘बुध्द और उसका धम्म’ इन ग्रंथों को भी कहा जा सकता है।एक अम्बेडकरवादी होना तभी सार्थक है जब वह व्यक्ति वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपना कर समाज और मानवहित में कार्यरत हो। सुनी सुनाई या रुढ़िवादी विचारधाराओं को अपनाना आंबेडकरवाद  कतई नहीं है।
आज हर तरफ तथाकथित अम्बेडकरवादी पैदा होते जा रहे है, परन्तु अपनी रुढ़िवादी सोच को वे लोग छोड़ने को तैयार नहीं है। क्या आज तक रुढ़िवादी सोच से किसी मानव या समाज का उद्धार हो पाया है? ??? अगर ऐसा होता तो शायद आंबेडकरवाद  का जन्म ही नहीं हो पाता। अम्बेडकरवादी कहलाने से पहले रुढ़िवादी विचारों को छोड़ना पड़ेगा। वैज्ञानिक तथ्यों पर विचार करना पड़ेगा, तभी अम्बेडकरवादी कहलाना सार्थक होगा।
आंबेडकरवाद  दुनिया की सबसे प्रभावशाली और विकसित विचारधारा का नाम है, दुनिया में ऐसी कोई भी समस्या नहीं है जिसका समाधान आंबेडकरवाद  में ना हो। आइये, आंबेडकरवाद  के बारे कुछ जानते है:
  1. गैर बराबरी वाली व्यवस्था को बदलकर मानवतावादी व्यवस्था का निर्माण करना आंबेडकरवाद है।
  2. आंबेडकरवाद यह मानव मुक्ती का विचार है, एक वैज्ञानिक दृष्टीकोण है।
  3. मानवतावाद ही आंबेडकरवाद है।
  4. मानवीय गरिमा (human dignity) के लिये चलाया गया आंदोलन ही आंबेडकरवाद है।
  5. मानव का इसी जन्म में कल्याण करने वाली विचारधारा का नाम आंबेडकरवाद है।
6.सबकी मुक्ति, विकास और मानव कल्याण का मार्ग ही आंबेडकरवाद  है।
  1. इंसान को जन्म देनेवाली, जीवन जिने का मार्ग देने वाली विचारधारा आंबेडकरवाद है।
  2. मानसिक और सामाजिक उत्थान, आर्थिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक बदलाव को आंबेडकरवाद कहा जा सकता है।
  3. आंबेडकरवाद एक ऐसा विचार एवं आंदोलन है, जो अन्याय और शोषण के खिलाफ कार्यरत रहता है और उसकी जगह विकल्प के रूप में एक मानवतावादी व्यवस्था पेश करता है।
  4.  वर्चस्ववाद का विनाश करने वाली क्रांतिकारी विचारधारा को आंबेडकरवाद कहते है।
  5. आंबेडकरवाद यह केवल विचार का दर्शन ही नही है बल्की वह सामाजिक-शैक्षणिक-धार्मिक-आर्थिक एवं सांस्कृतिक जीवन में बदलाव लाने का एक संपूर्ण आंदोलन है।
  6. आंबेडकरवाद एक ऐसी विचारधारा है जो हमें मानवतावाद की ओर ले जाती है। व्यवस्था के गुलाम लोगो को गुलामी से मुक्त कर मानवतावाद स्थापित करना ही आंबेडकरवाद है।
सम्पूर्ण मानवजाति का जिसमे विकास हो ऐसी , समता–स्वतंत्रता–बंधुत्व एवं न्याय इन तत्वों  के आधार पर बनी एक सम्पूर्ण  सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना ही आंबेडकरवाद  है।

समय निकालकर जरुर पढें



🙏समय निकालकर जरुर पढें🙏
     अंबेडकरवाद क्या है ?
आज हर कोई कहता नज़र आता है कि मैं अम्बेडकरवादी हूँ.... लेकिन उसको ये बड़ी मुस्किल से पता होता है कि अम्बेडकरवाद असल में है क्या?
अम्बेडकरवाद किसी भी धर्म, जाति या रंगभेद को नहीं मानता, अम्बेडकरवाद मानव को मानव से जोड़ने या मानव को मानव बनाने का नाम है।                                     
अम्बेडकरवाद वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर मानव के उत्थान के लिए किये जा रहे आन्दोलन या प्रयासों के नाम है।
अम्बेडकरवाद भारत के संविधान को भी कहा जा सकता है।
एक अम्बेडकरवादी होना तभी सार्थक है जब मानव वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपना कर समाज और मानवहित में कार्य किया जाये।
सुनी सुनाई या रुढ़िवादी विचारधाराओं को अपनाना अम्बेडकरवाद नहीं है। 
आज हर तरफ तथाकथित अम्बेडकरवादी पैदा होते जा रहे है.... परन्तु अपनी रुढ़िवादी सोच को वो लोग छोड़ने को तैयार ही नहीं है। क्या आज तक रुढ़िवादी सोच से किसी मानव या समाज का उद्धार  हो पाया है ? ??? 
अगर ऐसा होता तो शायद अम्बेडकरवाद का जन्म ही नहीं हो पाता। अम्बेडकरवादी कहलाने से पहले रुढ़िवादी विचारों को छोड़ना पड़ेगा। वैज्ञानिक तथ्यों पर विचार करना पड़ेगा, तभी अम्बेडकरवादी कहलाना सार्थक होगा।               
अम्बेडकरवाद दुनिया की सबसे प्रतिभाशाली और विकसित विचारधारा का नाम है, दुनिया में ऐसी कोई समस्या ही नहीं है जिसका समाधान अम्बेडकरवाद में ना हो। आइये आपको अम्बेडकरवाद के बारे कुछ बताते है:    
1. अपमानित, अमानवीय, अवैज्ञानिक, अन्याय एवं असमान सामाजिक व्यवस्था से दुखी मानव की इसी जन्म में आंदोलन से मुक्ती कर, समता–स्वतंत्रता–बंधुत्व एवं न्याय के आदर्श समाज में मानव और मानव (स्त्री पुरुष समानता भी) के बीच सही सम्बन्ध स्थापित करने वाली नयी क्रांतिकारी मानवतावादी विचारधारा को अम्बेडकरवाद कहते है।
2. जाती-वर्ग-स्त्री-पुरुष-रंगभेद की व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव लाकर एक न्यायमुक्त, समान, बराबरी, वैज्ञानिक, तर्कसंगत एवं मानवतावादी सामाजिक व्यवस्था बनाने वाले तत्वज्ञान को अम्बेडकरवाद कहते है। जिससे मानव को इसी जन्म में मुक्त किया जा सके।
3. व्यक्ती विकास के अंतिम लक्ष को प्राप्त करने की दृष्टी से समता-स्वतंत्रता-बंधुत्व और न्याय इन लोकतंत्र निष्ठ मानवी मूल्यों को आधारभूत मानकर संपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन (समग्रक्रांती) लानेवाले दर्शन को (तत्वज्ञान) को अम्बेडकरवाद कहते है।
4. ब्राम्हणवाद पर आधारित गैरबराबरी वाली व्यवस्था को बदलकर मानवतावादी व्यवस्था बनाने वाली विचारधारा अम्बेडकरवाद है। संपूर्ण मानव का निर्माण समता-स्वतंत्रता-बंधुत्व एवं न्याय के आधार पर करने वाली सामाजिक व्यवस्था बनाने की विचारधारा को अम्बेडकरवाद कहते है। ऐसी व्यवस्था में सबको विकास एवं समान संधि मिलती है।
साधारण परिभाषा इस प्रकार भी दे सकते हैं ।
1. गैर बराबरी वाली व्यवस्था को बदलकर मानवतावादी व्यवस्था को निर्मिती करना अम्बेडकरवाद है।
2. अम्बेडकरवाद यह मानव मुक्ती का विचार है, यह वैज्ञानिक दृष्टीकोण  है।
3. इंसानियत का नाता ही अम्बेडकरवाद है।
4. मानव गरिमा (human dignity) के लिये चलाया गया आंदोलन ही अम्बेडकरवाद है।
5. मानव का इसी जन्म में कल्याण करने वाली विचारधारा अम्बेडकरवाद है।
6.सबकी मुक्ति , विकास और मानव कल्याण का मार्ग ही अम्बेडकरवाद है।
7. इंसान को जन्म देनेवाली, जीवन जिने का मार्ग देने वाली विचारधारा अम्बेडकरवाद है।
8. मानसिक और सामाजिक उत्थान, आर्थिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक बदलाव को अम्बेडकरवाद कहा जा सकता है।                     
9. अम्बेडकरवाद एक ऐसा विचार एवं आंदोलन है, जो अन्याय और शोषण के खिलाफ है और उस की जगह एक मानवतावादी वैकल्पिक व्यवस्था बनाता है। यह संपूर्ण वैज्ञानिक दृष्टीकोन पर आधारित है।
10. ब्राम्हणवाद का विनाश करने वाली क्रांतिकारी विचारधारा को अम्बेडकरवाद कहते है। 

11. अम्बेडकरवाद केवल यह विचार का दर्शन ही नही है बल्की यह सामाजिक शैक्षणिक-धार्मिक-आर्थिक एवं सांस्कृतिक जीवन में बदलाव लाने का एक संपूर्ण आंदोलन है। 
12. अम्बेडकरवाद यह एक ऐसी विचारधारा है जो हमें मानवतावाद की ओर ले जाती है। व्यवस्था के गुलाम लोगो को गुलामी से मुक्त कर मानवतावाद स्थापित करना ही अम्बेडकरवाद है।
13. संपूर्ण मानव का निर्माण समता–स्वतंत्रता–बंधुत्व एवं न्याय के आधार पर करने वाली सामाजिक व्यवस्था बनाना यह अम्बेडकरवाद है।
इस प्रकार इस समाज व्यवस्था में सबका सर्वांगीण विकास और सबको समान संधी मिलती है।
जय भीम नमोः बुद्धाय
जय कांशी राम

अम्बेडकरवाद

आज जिसे देखो वहीं, कहता नज़र आता है कि "मैं अम्बेडकरवादी हूँ"। लेकिन क्या उसे ये पता होता है की "अम्बेडकरवाद" है क्या? किसी किसी को शायद ये बड़ी मुश्किल से पता होता है कि "अम्बेडकरवाद" असल में है क्या?

अम्बेडकरवाद" किसी भी धर्म, जाति, रूढ़वादिता, अंधविश्वास, अज्ञानता,किसी भी प्रकार के भेदभाव या रंगभेद को नहीं मानता, अम्बेडकरवाद मानव को मानव से जोड़ने या मानव को मानवता के लिए बनाने का नाम है। अम्बेडकरवाद वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर मानव के उत्थान के लिए किये जा रहे आन्दोलन या प्रयासों के नाम है।

एक अम्बेडकरवादी होना तभी सार्थक है जब मानव, वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपना कर समाज और मानव हित में कार्य किया जाये।सुनी सुनाई या रुढ़िवादी विचारधाराओं को अपनाकर जीवन जीना अम्बेडकरवाद नहीं है।आज हर तरफ तथाकथित अम्बेडकरवादी पैदा होते जा रहे है.... परन्तु अपनी रुढ़िवादी सोच को वो लोग छोड़ने को तैयार ही नहीं है। क्या आज तक रुढ़िवादी सोच से किसी मानव या समाज का उद्धार हो पाया है? ........ अगर ऐसा होता तो शायद अम्बेडकरवाद का जन्म ही नहीं हो पाता। अम्बेडकरवादी कहलाने से पहले रुढ़िवादी विचारों को छोड़ना पड़ेगा। वैज्ञानिक तथ्यों पर विचार करना पड़ेगा, तभी अम्बेडकरवादी कहलाना सार्थक होगा।अम्बेडकरवाद दुनिया की सबसे प्रतिभाशाली और विकसित विचारधारा का नाम है, दुनिया में ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसका समाधान अम्बेडकरवाद में ना हो।

अम्बेडकरवाद के बारे कुछ महत्वपूर्ण तथ्य जो कि निम्नलिखित है:-

(1) रूढ़िवादी, शोषित, अमानवीय, अवैज्ञानिक, अन्याय एवं असमान सामाजिक व्यवस्था से दुखी मानवों की इसी जन्म में आंदोलन द्वारा मुक्ती प्रदान कर, समता–स्वतंत्र–बंधुत्व एवं न्याय के आदर्श समाज में मानव और मानव (स्त्री पुरुष समानता भी) के बीच सही सम्बन्ध स्थापित करने वाली नयी क्रांतिकारी मानवतावादी विचारधारा को अम्बेडकरवाद कहते है।

(2) जाती-वर्ग,छूत-अछूत,ऊँच-नीच,स्त्री-पुरुष, शैक्षिक व्यवस्था, रंगभेद की व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव लाकर एक न्याययुक्त, समानतायुक्त, भेद-भाव मुक्त, शैक्षिक,वैज्ञानिक, तर्कसंगत एवं मानवतावादी सामाजिक व्यवस्था बनाने वाले तत्वज्ञान को अम्बेडकरवाद कहते है। जिससे मानव को इसी जन्म में रूढ़िवादी जंजीरो से मुक्त किया जा सके।

(3) व्यक्ति विकास के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करने की दृष्टी से समता-स्वतंत्रता-बंधुत्व और न्यायिक् इन लोकतंत्र निष्ठ मानवीय मूल्यों को आधारभूत मानकर संपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन लाने वाले दर्शन को (तत्वज्ञान) को अम्बेडकरवाद कहते है।

(4) उच्च् एवं निम्न,छूत-अछूत पर आधारित गैरबराबरी वाली व्यवस्था को बदलकर समतापूर्ण मानवतावादी व्यवस्था में बदलने वाली विचारधारा अम्बेडकरवाद है, ऐसी व्यवस्था में सबको विकास एवं समान संधि मिलती है।

साधारण परिभाषा इस प्रकार भी दे सकते हैं ।

गैर बराबरी वाली व्यवस्था को बदलकर समतायुक्त मानवतावादी व्यवस्था की निर्मित करना अम्बेडकरवादहै।

अम्बेडकरवाद यह मानव मुक्ती का विचार है, यह वैज्ञानिक दृष्टीकोण है।

इंसानियत का नाता ही अम्बेडकरवाद है।

मानव गरिमा (human dignity) के लिये चलाया गया आंदोलन ही अम्बेडकरवाद है।

मानव का इसी जन्म में कल्याण करने वाली विचारधारा अम्बेडकरवाद है।

मानव कल्याण का मार्ग ही अम्बेडकरवाद है। जीवन जीने का मार्ग देने वाली विचारधारा अम्बेडकरवाद है।

शारीरिक,मानसिक,आत्मिक और सामाजिक उत्थान, आर्थिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक बदलाव को अम्बेडकरवाद कहा जासकता है।

अम्बेडकरवाद एक ऐसा विचार एवं आंदोलन है, जो अन्याय और शोषण के खिलाफ है और उस की जगह एक मानवतावादी वैकल्पिक व्यवस्था बनाता है। यह संपूर्ण वैज्ञानिक दृष्टीकोण पर आधारितहै। ब्राम्हणवाद का विनाश करने वाली क्रांतिकारी विचारधारा को अम्बेडकरवाद कहते है। अम्बेडकरवाद केवल यह विचार का दर्शन ही नही है बल्कि यह सामाजिक, शैक्षणिक, धार्मिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक जीवन में बदलाव लाने का एक संपूर्ण आंदोलन है।

अम्बेडकरवाद यह ऐसी विचारधारा है जो हमें मानवतावाद की ओर ले जाती है। व्यवस्था के गुलाम लोगो को गुलामी से मुक्त कर मानवतावाद स्थापित करना ही अम्बेडकरवाद है।


तो अम्बेडकरवादी कहने वाले लोग कृपया ध्यान दे-


कि "मै अम्बेडकरवादी हूँ" केवल इतना कहने से कुछ नही होने वाला अम्बेडकरवाद की रंग में स्वयं को सरोबार करना पड़ेगा और अम्बेडकर जी के प्रति सच्ची श्रंद्धांजलियही होगी जब हम उनकी आंदोलन की ज्योति हमेशा जलाये रखेंगे।

My post


🔴🙏‼️माँसाहारी बनकर अपनी धार्मिक उर्जा खो मत देना‼️🙏
🙏‼️आदमी को, स्वाभाविक रूप से, एक शाकाहारी होना चाहिए, क्योंकि पूरा शरीर शाकाहारी भोजन के लिए बना है। वैज्ञानिक इस तथ्य को मानते हैं कि मानव शरीर का संपूर्ण ढांचा दिखाता है कि आदमी गैर-शाकाहारी नहीं होना चाहिए। आदमी बंदरों से आया है। बंदर शाकाहारी हैं, पूर्ण शाकाहारी। अगर डार्विन सही है तो आदमी को शाकाहारी होना चाहिए❗️
🙏‼️अब जांचने के तरीके हैं कि जानवरों की एक निश्चित प्रजाति शाकाहारी है या मांसाहारी: यह आंत पर निर्भर करता है, आंतों की लंबाई पर। मांसाहारी पशुओं के पास बहुत छोटी आंत होती है। बाघ, शेर इनके पास बहुत ही छोटी आंत है, क्योंकि मांस पहले से ही एक पचा हुआ भोजन है। इसे पचाने के लिये लंबी आंत की जरूरत नहीं है। पाचन का काम जानवर द्वारा कर दिया गया है। अब तुम पशु का मांस खा रहे हो। यह पहले से ही पचा हुआ है, लंबी आंत की कोई जरूरत नहीं है। आदमी की आंत सबसे लंबी है: इसका मतलब है कि आदमी शाकाहारी है। एक लंबी पाचनक्रिया की जरूरत है, और वहां बहुत मलमूत्र होगा जिसे बाहर निकालना होगा।
🙏‼️अगर आदमी मांसाहारी नहीं है और वह मांस खाता चला जाता है, तो शरीर पर बोझ पड़ता है। पूरब में, सभी महान ध्यानियों ने, बुद्ध, महावीर, ने इस तथ्य पर बल दिया है। अहिंसा की किसी अवधारणा की वजह से नहीं, वह गौण बात है, पर अगर तुम यथार्थतः गहरे ध्यान में जाना चाहते हो तो तुम्हारे शरीर को हल्का होने की जरूरत है, प्राकृतिक, निर्भार,प्रवाहित। तुम्हारे शरीर को बोझ हटाने की जरूरत है; और एक मांसाहारी का शरीर बहुत बोझिल होता है।
🙏‼️जरा देखो, क्या होता है जब तुम मांस खाते हो: जब तुम एक पशु को मारते हो, क्या होता है पशु को, जब वह मारा जाता है? बेशक, कोई भी मारा जाना नहीं चाहता। जीवन स्वयं को लंबाना चाहता है, पशु स्वेच्छा से नहीं मर रहा है। अगर कोई तुम्हें मारता है, तुम स्वेच्छा से नहीं मरोगे। अगर एक शेर तुम पर कूदता है और तुमको मारता है, तुम्हारे मन पर क्या बीतेगी? वही होता है जब तुम एक शेर को मारते हो। वेदना, भय, मृत्यु, पीड़ा, चिंता, क्रोध, हिंसा, उदासी ये सब चीजें पशु को होती हैं। उसके पूरे शरीर पर हिंसा, वेदना, पीड़ा फैल जाती है। पूरा शरीर विष से भर जाता है, जहर से। शरीर की सब ग्रंथियां जहर छोड़ती हैं क्योंकि जानवर न चाहते हुए भी मर रहा है। और फिर तुम मांस खाते हो, वह मांस सारा विष वहन करता है जो कि पशु द्वारा छोड़ा गया है। पूरी ऊर्जा जहरीली है। फिर वे जहर तुम्हारे शरीर में चले जाते हैं।
🙏‼️वह मांस जो तुम खा रहे हो एक पशु के शरीर से संबंधित था। उसका वहां एक विशेष उद्देश्य था। चेतना का एक विशिष्ट प्रकार पशु-शरीर में बसता था। तुम जानवरों की चेतना की तुलना में एक उच्च स्तर पर हो, और जब तुम पशु का मांस खाते हो, तुम्हारा शरीर सबसे निम्न स्तर को चला जाता है, जानवर के निचले स्तर को। तब तुम्हारी चेतना और तुम्हारे शरीर के बीच एक अंतर मौजूद होता है, और एक तनाव पैदा होता है और चिंता पैदा होती है।
🙏‼️व्यक्ति को वही चीज़ें खानी चाहिए जो प्राकृतिक हैं, तुम्हारे लिए प्राकृतिक। फल, सब्जियां , मेवे आदि, खाओ जितना ज्यादा तुम खा सको। खूबसूरती यह है कि तुम इन चीजों को जरूरत से अधिक नहीं खा सकते। जो कुछ भी प्राकृतिक है हमेशा तुम्हें संतुष्टि देता है, क्योंकि यह तुम्हारे शरीर को तृप्त करता है, तुम्हें भर देता है। तुम परिपूर्ण महसूस करते हो। अगर कुछ चीज अप्राकृतिक है वह तुम्हें कभी पूर्णता का एहसास नहीं देती। आइसक्रीम खाते जाओ, तुमको कभी नहीं लगता है कि तुम तृप्त हो। वास्तव में जितना अधिक तुम खाते हो, उतना अधिक तुम्हें खाते रहने का मन करता है। यह खाना नहीं है। तुम्हारे मन को धोखा दिया जा रहा है। अब तुम शरीर की जरूरत के हिसाब से नहीं खा रहे हो; तुम केवल इसे स्वाद के लिए खा रहे हो। जीभ नियंत्रक बन गई है।
🙏‼️जीभ नियंत्रक नहीं होनी चाहिए, यह पेट के बारे में कुछ नहीं जानती। यह शरीर के बारे में कुछ भी नहीं जानती। जीभ का एक विशेष उद्देश्य है: खाने का स्वाद लेना। स्वाभाविक रूप से, जीभ को परखना होता है, केवल यही चीज है, कौन सा खाना शरीर के लिए है, मेरे शरीर के लिए और कौन सा खाना मेरे शरीर के लिए नहीं है। यह सिर्फ दरवाजे पर चौकीदार है; यह स्वामी नहीं है, और अगर दरवाजे पर चौकीदार स्वामी बन जाता है, तो सब कुछ अस्तव्यस्त हो जाएगा।
🙏‼️अब विज्ञापनदाता अच्छी तरह जानते हैं कि जीभ को बरगलाया जा सकता है, नाक को बरगलाया जा सकता है। और वे स्वामी नहीं हैं। हो सकता है तुम अवगत नहीं हो: भोजन पर दुनिया में अनुसंधान चलता रहता है, और वे कहते हैं कि अगर तुम्हारी नाक पूरी तरह से बंद कर दी जाए, और तुम्हारी आंखें बंद हों, और फिर तुम्हें खाने के लिए एक प्याज दिया जाए, तुम नहीं बता सकते कि तुम क्या खा रहे हो। तुम सेब और प्याज में अंतर नहीं कर सकते अगर नाक पूरी तरह से बंद हो क्योंकि आधा स्वाद गंध से आता है, नाक द्वारा तय किया जाता है, और आधा जीभ द्वारा तय किया जाता है। ये दोनों नियंत्रक हो गए हैं। अब वे जानते हैं कि : आइसक्रीम पौष्टिक है या नहीं यह बात नहीं है। उसमें स्वाद हो सकता है, उसमें कुछ रसायन हो सकते हैं जो जीभ को परितृप्त भले ही करें मगर शरीर के लिए आवश्यक नहीं होते।
❗️आदमी उलझन में है, भैंसों से भी अधिक उलझन में। तुम भैंसों को आइसक्रीम खाने के लिए राजी नहीं कर सकते। कोशिश करो!
एक प्राकृतिक खाना…और जब मैं प्राकृतिक❗️
🙏‼️कहता हूं, मेरा मतलब है जो कि तुम्हारे शरीर की जरूरत है। एक बाघ की जरूरत अलग है, उसे बहुत ही हिंसक होना होता है। यदि तुम एक बाघ का मांस खाओ तो तुम हिंसक हो जाओगे, लेकिन तुम्हारी हिंसा कहां व्यक्त होगी? तुमको मानव समाज में जीना है, एक जंगल में नहीं। फिर तुमको हिंसा को दबाना होगा। फिर एक दुष्चक्र शुरू होता है।
🙏‼️जब तुम हिंसा को दबाते हो, तब क्या होता है? जब तुम क्रोधित, हिंसक महसूस करते हो, एक तरह की जहरीली ऊर्जा निकलती है, क्योंकि वह जहर एक स्थिति उत्पन्न करता है जहां तुम वास्तव में हिंसक हो सकते हो और किसी को मार सकते हो। वह ऊर्जा तुम्हारे हाथ की ओर बहती है; वह ऊर्जा तुम्हारे दांतों की ओर बहती है। यही वे दो स्थान हैं जहां से जानवर हिंसक होते हैं। आदमी जानवरों के साम्राज्य का हिस्सा है।
🙏‼️जब तुम गुस्सा होते हो, तो ऊर्जा निकलती है और यह हाथ और दांत तक आती है, जबड़े तक आती है, लेकिन तुम मानव समाज में जी रहे हो और क्रोधित होना हमेशा लाभदायक नहीं है। तुम एक सभ्य दुनिया में रहते हो और तुम एक जानवर की तरह बर्ताव नहीं कर सकते। यदि तुम एक जानवर की तरह व्यवहार करते हो, तो तुम्हें इसके लिए बहुत अधिक भुगतान करना पड़ेगा और तुम उतना देने को तैयार नहीं हो। तो फिर तुम क्या करते हो? तुम हाथ में क्रोध को दबा देते हो, तुम दांत में क्रोध को दबा देते हो, तुम एक झूठी मुस्कान चिपका लेते हो और तुम्हारे दांत क्रोध को इकट्ठा करते जाते हैं।
🙏‼️मैंने शायद ही कभी प्राकृतिक जबड़े के साथ लोगों को देखा है। वह प्राकृतिक नहीं होता, अवरुद्ध, कठोर क्योंकि उसमें बहुत ज्यादा गुस्सा है। यदि तुम किसी व्यक्ति के जबड़े को दबाओ, क्रोध निकाला जा सकता है। हाथ बदसूरत हो जाते हैं। वे मनोहरता खो देते हैं, वे लचीलापन खो देते हैं, क्योंकि बहुत अधिक गुस्सा वहां दबा है। जो लोग गहरी मालिश पर काम कर रहे हैं, उन्हें पता चला है कि जब तुम हाथ को गहराई से छूते हो, हाथ की मालिश करते हो, व्यक्ति क्रोधित होना शुरू होता है। कोई कारण नहीं है। तुम आदमी की मालिश कर रहे हो और अचानक वह गुस्से का अनुभव करने लगता है। यदि तुम जबड़े को दबाओ, व्यक्ति फिर गुस्सा हो जाता हैं। वे इकट्ठे किए हुए क्रोध को ढोते हैं। ये शरीर की अशुद्धताएं हैं: उन्हें निकालना ही है। अगर तुम उन्हें नहीं निकालोगे तो शरीर भारी रहेगा🙏‼️OSHO‼️🙏♣️