Wednesday, 3 June 2026

LDC 2026

 LDC भर्ती परीक्षा 2026 (कुल पद 10644)*

परीक्षा तिथि : 05 जुलाई 2026*

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Friday, 5 March 2021

SSC GD

 केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), सचिवालय सुरक्षा बल (एसएसएफ) में कॉन्सटेबल (जनरल ड्यूटी) और असम राइफल्स में राइफलमैन (जनरल ड्यूटी) के पदों की घोषित रिक्तियों के लिए कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) द्वारा चयन प्रक्रिया हर वर्ष आयोजित की जाती है। वर्ष 2021 के लिए एसएससी द्वारा कॉन्सटेबल (जीडी) और राइफलमैन (जीडी) की भर्ती परीक्षा की अधिसूचना जल्द ही जारी की जानी है। आयोग द्वारा जारी परीक्षा कैलेंडर के मुताबिक एसएससी जीडी कॉन्सटेबल नोटिफिकेशन 2021 को 21 मार्च को जारी किया जाना प्रस्तावित है। अधिसूचना जारी होने के साथ ही आवेदन की प्रक्रिया भी शुरू हो जाएगी और उम्मीदवार 10 मई तक अपना अप्लीकेशन सबमिट कर पाएंगे।


आयोग ने जीडी कॉन्सटेबल भर्ती परीक्षा 2021 के पहले चरण का आयोजन 2 अगस्त को किये जाने की घोषणा की है। देश भर के लाखों उम्मीदवारों (वर्ष 2018 में 30 लाख से अधिक) के हर वर्ष परीक्षा में सम्मिलित होने के कारण परीक्षा का आयोजन अलग-अलग तिथियों पर किया जाता है। अगस्त के शुरू में ही आरंभ होने वाली एसएसजी जीडी कॉन्सटेबल परीक्षा 25 अगस्त तक चलेगी। वहीं, पिछले वर्ष के पैटर्न को देखें को परीक्षा में सम्मिलित होने के लिए एडमिट कार्ड जुलाई 2021 में जारी किये जाने की संभावना है।



ऐसे होता है सेलेक्शन

एसएससी जीडी कॉन्सटेबल भर्ती के लिए निर्धारित चयन प्रक्रिया में तीन चरण होते हैं। पहले चरण में कंप्यूटर आधारित परीक्षा (सीबीटी) का आयोजन किया जाएगा। सीबीटी में सफल घोषित उम्मीदवारों के लिए शारीरिक दक्षता परीक्षा (पीईटी) / शारीरिक मानक परीक्षा (पीएसटी) का आयोजन किया जाता है। इस चरण में सफल घोषित उम्मीदवारों को विस्तृत चिकित्सा परीक्षण (डीएमई) के लिए आमंत्रित किया जाता है। डीएमई के अगले हिस्से में समीक्षा चिकित्सा परीक्षा (आरएमई) में सफल पाए जाने पर अंतिम रूप से चयनित उम्मीदवारों की सूची आयोग द्वारा जारी की जाती है और फिर उम्मीदवारों की वरीयता और बलों की रिक्तियों के सापेक्ष बनी मेरिट लिस्ट के अनुसार उम्मीदवारों को सम्बन्धित बल में प्रशिक्षण और नियुक्ति के लिए भेज दिया जाता है।


जानें योग्यता मानंदड

एसएससी जीडी कॉन्सटेबल परीक्षा में सम्मिलित होने के लिए उम्मीदवारों को 10वीं कक्षा उत्तीर्ण होना चाहिए और आयु 18 से 23 वर्ष के बीच होनी चाहिए। आरक्षित वर्गों के उम्मीदवारों को अधिकतम आयु सीमा में छूट दी जाती है।



Official Website

https://ssc.nic.in








Thursday, 5 April 2018

संत रविदास से हम क्या सीखें और भविष्य में क्या करें ?

परम संत रविदास का नाम ही एक अमृत की बूँद के जैसा है. जैसे भेदभाव, छुआछूत और शोषण से भरे धर्म के रेगिस्तान में अपनेपन, समानता और भाईचारे की छाँव मिल जाए. जैसे कि प्यास से तडपते हुए आदमी को ठंडा पानी मिल जाए. ऐसे हैं संत रविदास. इनकी जितनी तारीफ़ की जाए सो कम है. जो लोग रविदास को प्रेम करते हैं उन्हें बहुत सोच समझकर उनकी तारीफ़ करनी चाहिए. निंदा कैसी भी करनी हो कीजिये लेकिन तारीफ़ बहुत जान समझकर की जानी चाहिए. ये बात हमारे दलित युवाओं को बहुत गहराई से समझनी चाहिए. इसीलिये इस लेख में मैं संत रविदास को उनके असली रूप में सामने लाऊंगा ताकि संत रविदास को हिन्दू या ब्राह्मण सिद्ध करने के षड्यंत्र को बेनकाब किया जा सके.
हमारे दलित और आदिवासी युवाओं को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि दलित और मूलनिवासी संतों को जबरदस्ती ब्राह्मण या हिन्दू साबित करने का काम इस देश में चलता आया है. उससे बचकर रहना चाहिए इसी में दलित और मूलनिवासी समाज की भलाई है. हमारे महापुरुष हमारे अपने हैं वे हमारी जाति में हमारे गरीब समाज में पैदा हुए थे. उन्होंने वही भेदभाव और अपमान सहा है जो हमारे बाप दादों ने हजारों साल तक सहा है. ऐसे में कोई ये कहे कि रविदास पिछले जन्म में ब्राह्मण थे तो इसका सीधा मतलब ये है कि वो आदमी हमसे हमारे महापुरुष को और हमारे बाप दादों की विरासत को चुराने आया है. उसे तुरंत अपने घर मोहल्ले और गाँव से बाहर निकाल दीजिये. वो हमारे संतों को खत्म करने आया है उससे हमें कोई बात नहीं करनी चाहिए.
हमारे दलित युवाओं पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है. हम सब जानते हैं कि संत रविदास, संत कबीर और बाबा साहेब अंबेडकर किस तरह से जिन्दगी भर सताए गए थे. इसके बावजूद उन्होंने जो काम किया है उसके कारण वे इतिहास में अमर हो गए हैं. उन्होंने हिन्दू धर्म के छुआछूत और पाखण्ड पर जो चोट की है उसे हमें याद रखना चाहिए. लेकिन दुःख की बात ये है कि हमारे युवा इनके बारे में ज्यादा नहीं जानते हैं. अंबेडकर के बारे में भी हमारे युवाओं में पढने की ललक नही है इसीलिये अंबेडकर के नाम पर राजनीति करने वाले लोग अपनी मनमानी कर लेते हैं. हमें अंबेडकर रविदास और कबीर को राजनीति से बाहर निकालकर पढ़ना चाहिए. हमारे घरों में बच्चों और औरतों को कबीर, रविदास और अंबेडकर को पढ़ाना समझाना चाहिए. फालतू की पुराण और भगवानों की कथाओं से अपने बच्चों और औरतों को बचाना चाहिए. ये अब बहुत जरुरी होता जा रहा है. अगर हमने ऐसा नहीं किया तो जिस तरह से कबीर का ब्राह्मणीकरण हुआ है उसी तरह रविदास और अंबेडकर का भी बुरा हाल हो सकता है.
ब्राह्मणवादियों ने ये कहानियां फैला रखी हैं कि संत रविदास एक दुसरे ब्राह्मण संत रामानंद के शिष्य थे. ये एकदम झूठी बात है. कबीर और रविदास दोनों ही रामानंद के शिष्य नहीं थे. आधुनिक रिसर्च ये बतलाती है कि ऐसे किसी रामानंद ने न तो कोई किताब लिखी है न उनके बारे में ऐतिहासिक या साहित्यिक जगत में कोई रिकार्ड उपलब्ध है. अब ये बड़ी मजाक की बात है कि सैकड़ों किताबें लिखने वाले कबीर और रविदास के गुरु में भी कुछ तो काबिलियत होनी चाहिए ना? कबीर या रविदास अगर किसी आदमी को गुरु बनाएंगे तो उस गुरु की भी कुछ किताबें या कुछ उपदेश तो मिलने चाहिए. लेकिन रामानन्द के नाम से ऐसा कुछ नहीं मिलता. इसका सीधा मतलब है कि रविदास और कबीर को हिन्दू और ब्राह्मण सिद्ध करने के लिए ही ये खेल रचा गया है.
ऐसा ही खेल भगवान बुद्ध के लिए रचा गया था. बुद्ध की शिक्षाओं ने इस देश के पाखंडी धर्म को बहुत हद तक उखाड़ फेंका था. बाद में चालबाज ब्राह्मणों ने बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित कर दिया और बुद्ध के भक्तों को भ्रमित करके वापस भेदभाव और जाती व्यवस्था के अन्दर खींच लिया. यही खेल अब रविदास कबीर और अंबेडकर के साथ चल रहा है. इससे हमें बचना होगा और अपने महापुरुषों को भी बचाना होगा.
अक्सर हमारे बहुजन समाज के भाई बहन न तो अपनी संख्या की शक्ति समझते हैं न अपनी परम्पराओं और महापुरुषों की शक्ति समझते हैं. भारत के अछूत, दलित, मूलनिवासी और शूद्र (जिन्हें ओबीसी) कहा जाता है – वे सब के सब एक ही हैं. उन्हें बांटकर आपस में लडवाया जाता है. दलित समाज के लोग और मूलनिवासी या आदिवासी लोग असल में हिन्दू हैं ही नहीं. वे हिन्दुओं की वर्ण व्यवस्था से बाहर के लोग हैं. हिन्दुओं के चार वर्ण होते हैं. उसमे आखिरी वर्ण शूद्र है. शूद्र का मतलब होता है सेवा करने वाले लोग. जितने भी लोग किसान, कुम्हार, बढई, जुलाहे, रंगरेज, लोहार, धोबी, चरवाहे, पशुपालक, दूध बेचने वाले हैं वे सब के सब शूद्र है.
इसीलिये यादव, अहीर सहित वे सभी लोग जो अपनी मेहनत से कुछ उपजाते हैं वे इस देश में शूद्र माने गए हैं. उन्हें ऊँची जाति के लोगों के शास्त्र पढने और मंदिरों में जाने की इजाजत नहीं है. ऊँची जाति के लोग वे होते हैं जो मेहनत करने वालों की कमाई खाकर निठल्ले बैठे रहते हैं या उनकी उपजाई फसलों का व्यापार और दलाली करते हैं. सबसे ऊँची जाति वो मानी जाति है जो न कुछ अनाज पैदा करती है न व्यापार करती है बल्कि जो तोता मैना की कहानियों जैसी धर्म की कहानियां सुनाकर या श्राद्ध आदि के उलटे सीधे पूजा पाठ करवाकर गरीबों से दक्षिणा मांगती हैं.
शूद्र होना सम्मान की बात है. शूद्र अपनी मेहनत से अनाज उगाता है, पशु चराता है, लकड़ी लोहे या कपडे के सामान बनाता है. लेकिन शूद्रों या मेहनत करने वालों को इस देश में नीच कहा गया है. काम करने वालों को कमीन कहा जाता है. इस देश में कमीन एक गाली है. सोचिये जब शूद्रों की ये हालत है तो दल्तिओं और आदिवासियों की क्या हालत होगी? असल में दलित और आदिवासी इन शूद्रों से भी नीचे माने जाते हैं. ये एक तरह से पांचवे वर्ण कहे जाते हैं जो अन्त्यज कहलाता है. ये हिन्दुओं के ही वर्ण होते हैं. इसलिए पांचवे वर्ण या अन्त्यज का मतलब हुआ कि दलित और मूलनिवासी वे लोग हैं जो हिन्दू धर्म से बाहर हैं.
इसीलिये हिन्दुओं के महान धर्मगुरु और क़ानून निर्माता महर्षि मनु ने शूद्रों और अछूतों को शास्त्र पढने की और मंदिरों में प्रवेश करने की इजाजत नहीं दी है. आज के शंकराचार्य भी यही कहते हैं कि दलितों को हिन्दुओं क मंदिरों में जाने की इजाजत नहीं है. हमारे दलित भाई बहन इस बात से नाराज होते हैं. ये गलत बात है. दलितों को हिन्दुओं की इज्जत करनी चाहिए. हिन्दुओं का अपना धर्म है उनके अपने मंदिर हैं वे जिसे चाहें उसे अपने मंदिर में घुसने दें और जिसे चाहे उसे मना करके रोक दें. जैसे हमारे घर में रसोई होती है हम अपनी मर्जी से उसमे किसी को आने देंगे. हर कोई उसमे नहीं घुस सकता. इसी तरह मुसलामानों को हक़ है कि वे अपनी मस्जिद में किसे घुसने देंगे और किसे नहीं. लेकिन हमारे भोले भाले दलित और आदिवासी लोग नहीं समझते कि उनके घुसने से हिन्दू मंदिर और उनका भगवान् अपवित्र हो जाता है. हमें उनकी इस बात को समझना चाहिए, हमें उन्हें दुःख नहीं देना चाहिए और उनके मंदिर में नहीं जाना चाहिए. हमारे अपने देवी देवता हैं, हमारा अपना अलग धर्म है और हमारे अपने महापुरुष और उनके शास्त्र हैं. हम अपने महापुरुष और अपने मंदिर को छोड़कर दूसरों के मन्दिर में क्यों जाएँ? यह बात सबको समझनी चाहिए.
संत रविदास हमारे अपने हैं. वे चमार जाति में पैदा हुए और उसी जाति में मरे. वे न तो पिछले जन्म के ब्राह्मण थे और न किसी ब्राह्मण गुरु के शिष्य थे. उन्होंने जिस तरह की भक्ति की उसका राम या कृष्ण से कोई संबंध नहीं है. वे सीधे सीधे भगवान् बुद्ध की परम्परा में हैं. वे जिस तरह की क्रान्ति की और समाज में छुआछूत मिटाने की बात कर रहे थे वो बात हिन्दू धर्म में कहीं नहीं होती है. वो बात सिर्फ जैनों और बौद्धों में होती आयी है. जैनों के भगवान् महावीर और बौद्धों के भगवान् बुद्ध – ये दो लोग हुए हैं जिन्होंने छुआछूत, जाती व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था और वेदों का विरोध किया है. इसीलिये बौद्धों को इस देश से ख़त्म कर दिया गया और जैन लोग हिन्दुओं से समझौता करके ज़िंदा बचे हुए हैं.
लेकिन हमारे लिए ऐसी कोई मजबूरी नहीं है. हम न तो हमारे महापुरुष की चोरी होने देंगे न ही उसके नाम या काम के साथ किसी तरह का कोई समझौता होने देंगे. हम रविदास को चमारों के संत ही कहेंगे. वे बहुत बड़े क्रांतिकारी हैं. उन्हें उनके मूल रूप में ही समझेंगे और अपने लोगों को समझायेंगे. वे जिस तरह की भक्ति कर रहे हैं उसको ठीक से समझना चाहिए. उसी से समझ में आयेगा कि उनकी असली विचारधारा क्या है और वे क्या हासिल करना चाहते थे.
हिन्दू धर्म में इश्वर की कल्पना सगुण और साकार रूप में की गयी है. हिन्दू चाहे जो कहें जितनी भी निराकार ब्रह्म की बात करें लेकिन उनकी सौ प्रतिशत भीड़ मूर्तियों और मंदिरों से ही संचालित होती है. उनके इश्वर के न सिर्फ नाम और शरीर होते हैं बल्कि उनका इश्वर युद्ध भी करता है प्रसन्न होता है और नाराज होकर श्राप देता है. वो इश्वर बहुत विलासिता का जीवन जीता है और गरीब अछूतों और स्त्रीयों को अपने मंदिर में आने की इजाजत नहीं देता है.
इसी कारण गरीबों और अछूतों के संत गोरखनाथ, कबीर, रविदास, नानक, नामदेव जैसे संतों ने इश्वर को निर्गुण कहकर पूजा है. हमारे संत रविदास ने भी जिस इश्वर को माना है वो इश्वर दुनिया बनाने वाला या चलाने वाला कोई कलेक्टर नहीं है. बल्कि वह प्रकृति की सबसे बड़ी शक्ति है जिससे सब कुछ बनता है और सब कुछ उसी में विलीन हो जाता है. ये एक वैज्ञानिक बात है कोई अंधविश्वास नहीं है.
रविदास का इश्वर भेदभाव नहीं करता. वो कुदरत या प्रकृति का ही रूप है. जैसे सूरज की धुप सबको बराबर मिलती है. उसकी नजर में कोई उंचा नीचा नहीं होता. रविदास का वो इश्वर सबको एक जैसा प्यार करता है और जाति और छुआछूत को नहीं मानता है. कबीर की तरह रविदास भी निर्गुण को मानते हैं. निर्गुण का मतलब होता है जिसका कोई गुण न हो. इसका सरल भाषा में मतलब ये है कि ऐसे इश्वर का न कोई नाम है, न रंग है, न जाति है, न वर्ण है, न उसके हाथ में कोई हथियार हैं, न कोई धन दौलत है. वह न पुरुष है न स्त्री है.
इसे ठीक से समझिये. इस इश्वर का कोई एक ठिकाना भी नहीं है, कोई मन्दिर नही है. इसीलिये अछूतों और महिलाओं को जब आर्य और ब्राह्मणों ने इश्वर की भक्ति करने से रोका और अपने मंदिरों से बाहर निकाला तो उन महिलाओं और अछूतों ने अपने ही ढंग से निर्गुण की भक्ति शुरू कर दी. जिन महिलाओं को और जिन अछूतों को मंदिर जाने से रोका गया उन्होंने कहा कि आप अपना भेदभाव करने वाला भगवान् अपने मंदिर में रखो हम अपने निर्गुण भगवान् को अपने दिल में रखते हैं. हम जहां हैं वहीं हमारा इश्वर है.
इस तरह अछूत संतों और महिलाओं ने पहली बार दुनिया को ये बात सिखाई कि इश्वर या भगवान् किसी मूर्ती या मन्दिर में नहीं होता है बल्कि जहां जहां सच्चा और साफ़ दिल है वहीं इश्वर मौजूद है. ऐसे ईश्वर को किसी तरह की रिश्वत या चढ़ावा देने की जरूरत नहीं है. इसे मुर्गा बकरा गाय या भैंस की या नारियल मिठाई आदि की चढ़ावे की जरूरत नहीं है. उसको ढूँढने की भी जरूरत नहीं है. वो सबके दिल में मौजूद है. उसके नाम पर न लड़ने की जरूरत है न अंध विश्वासी होकर निकम्मे अनपढ़ की तरह बैठने की जरूरत है.
संत रविदास खुद बहुत काम करते थे. मेवाड़ की रानी मीरा उनकी शिष्या थी अन्य रजवाड़े भी उनके भक्त थे लेकिन वे किसी से एक पैसा भी नहीं लेते थे. वे कबीर की तरह अपना गुजारा अपनी मेहनत से चलाते थे. इसी तरह हमें भी करना चाहिए. अपने बच्चों को वैज्ञानिक शिक्षा देकर इंग्लिश और कम्प्यूटर सहित पश्चिमी शिक्षा देकर कमाने के लायक बनाना चाहिए. संस्कृत, योग या धर्म की अन्धविश्वासी और बेकार की शिक्षाओं से हमारे बच्चों को बचाना चाहिए. निठल्ले बेरोजगार बैठकर समय खराब न करके संत कबीर और रविदास की तरह लगातार मेहनत और भक्ति दोनों एक साथ करनी चाहिए.
लेकिन आजकल जिस तरह से संत कबीर और रविदास को स्कूलों कालेजों में पढ़ाया जाता है उससे बचने की जरूरत है. अक्सर ही इन संतों को केवल और केवल भक्त बनाकर पेश किया जाता है. ये नहीं बतलाया जाता है कि ये बहुत अच्छे कारीगर और कुशल शिल्पी भी थे. ये बहुत ही अच्छे जूते और अच्छे कपडे बनाते थे. ये दोनों ही बहुत सुन्दर कलाकार भी थे. वे दिन भर निठल्ले बैठकर सिर्फ भक्ति भजन में ही नहीं लगे रहते थे. उनका काम ही उनकी भक्ति थी. जो लोग ये कहते हैं कि वे रात दिन राम नाम की भक्ति में लीन रहते थे वे लोग झूठ बोलते हैं. वे कबीर और रविदास को ऐसा आलसी भक्त बनाकर असल में दलितों और आदिवासियों को आलसी बनाना चाहते हैं ताकि उनकी वोटों की राजनीति और धर्म का धंधा चलता रहे. लेकिन हमारे पढ़े लिखे दलित भाई बहनों को इस चालबाजी में अब नहीं फसेंगे. वे अपनी समझदारी से इस चालबाजी से बच निकलेंगे.
हमारे युवाओं का सबसे पहला और सबसे बड़ा कर्त्तव्य ये है कि वे संत रविदास को एक क्रांतिकारी और समाज सुधारक की तरह समझें. उन्हें सिर्फ भक्ति भजन करने वाला आलसी न समझें. वे न भक्त हैं न आलसी हैं ना ही या भिखारी हैं. वे कर्मठ और वैज्ञानिक सोच वाले क्रांतिकारी सुधारक हैं जो समाज को बदलना चाहते थे. संत रविदास को एक क्रांतिकारी की तरह ही समझना चाहिए. उन्होंने जो काम किये और जिस तरह से धर्म और इश्वर की व्याख्या की वो सब समाज में छाये हुए छुआछूत को खत्म करने के लिए था. वे समाज में बराबरी और प्रेम बढाने का काम कर रहे थे. उनके नाम पर हमें भी यह कसम खानी चाहिए कि हम भी समाज में प्रेम और भाईचारा बढ़ाएंगे. हम इस छुआछूत और भेदभाव से भरे धर्म और सगुण भगवान् की गुलामी छोड़कर निर्गुण भगवान में भरोसा रखेंगे.
हमें यह कसम खानी चाहिए कि हम रविदास, कबीर और अंबेडकर की तरह उच्च शिक्षित और ज्ञानवान बनेंगे और अपनी मेहनत से अपना भविष्य बनायेंगे. हम किसी दुसरे के धर्म में या मंदिर में नहीं घुसेंगे. हमारे अपने संत महापुरुष देवी देवता और हमारा अपना धर्म है हम उसका पालन करेंगे. हम हिन्दुओं के मंदिर में घुसकर उनके भगवान को दुःख नहीं पहुंचाएंगे.

जाति विनाश कैसे हो?

“जाति विनाश अगर सवर्णों से अपेक्षित है तो ये व्यर्थ का प्रोजेक्ट है. लेकिन जाति विनाश खुद दलितों पिछड़ों से अपेक्षित है तो इस प्रोजेक्ट से बहुत उम्मीद की जा सकती है”
जाति विनाश कैसे होगा इसकी विस्तार से चर्चा करने से पहले दो वक्तव्य याद रखिये. महान आयरिश लेखक, विचारक और नाटककार जार्ज बर्नार्ड शॉ से एक बार किसी ने पूछा था कि नेता कौन होता है? शॉ ने मजाकिया अंदाज में चुटकी लेते हुए बताया कि “भीड़ जिस दिशा में जा रही हो उसी दिशा में झंडा उठाकर सबसे आगे हो लेने वाला ही नेता होता है.” दूसरा वक्तव्य डॉ. अंबेडकर का है जब वे अपनी प्रसिद्ध किताब “एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट” के दुसरे संस्करण की भूमिका लिख रहे थे. उन्होंने लिखा “अगर मैं हिंदुओं को यह समझा पाया कि वे भारत के बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी दूसरे भारतीय लोगों के स्वास्थ्य और उनकी खुशी के लिए खतरा है, तो मैं अपने काम से संतुष्ट हो पाऊंगा”. इन दो वक्तव्यों में जाहिर तौर पर उपर उपर कोई सीधा संबंध नहीं है लेकिन आगे के विस्तार में जाकर हम देखेंगे कि ये ‘अलग अलग’ वक्तव्य जाति उन्मूलन के मुद्दे पर बहुत दूर से एकदूसरे से कैसे जुड़ते हैं.
जाति विनाश या जाति का उन्मूलन सदा से भारतीय शूद्रों (ओबीसी) दलितों (अनुसूचित जातियों) दमितों (स्त्रीयों) का सपना रहा है. इसे लेकर जितना चिंतन मंथन और काम हुआ है उसकी बड़ी असफलता को साफ़ –साफ़ देखा जा सकता है. एक सामाजिक, राजनीतिक प्रोजेक्ट के रूप में इस मुद्दे पर जितना काम हुआ है उससे अपेक्षित परिणाम नहीं आये हैं बल्कि इस काम ने इन जातियों और समुदायों को पहचान या शिनाख्त की राजनीति (आइडेंटिटी पोलिटिक्स) की अंतहीन अँधेरी सुरंग में धकेल दिया है. इस अँधेरी सुरंग में ये ही पता नहीं चलता कि आपके नाम से आपके हक में नारे लगाने वाले राजनेताओं के हाथ में आपके लिए फूल हैं या खंजर है. इस अँधेरी राजनीति में सिर्फ शोर और नारे सुनकर जो लोग शामिल हुए हैं उनके चेहरों पर निराशा और पराजय का भाव साफ़ नजर आता है.
पहले जो लोग हाथों में फूल लेकर आपके साथ नारे लगा रहे थे उनके सभी फूल अब कमल के फूल बन गये हैं. सत्तारूढ़ पार्टी की विचारधारा और उनकी सरकारों की गुलामी करने में इन दलित आदिवासी या अल्पसंख्यक ‘क्रांतिकारियों’ को किसी तरह लज्जा का अनुभव नहीं हो रहा है. आज जब देश में दलितों आदिवासियों मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों पर सबसे ज्यादा हमले हो रहे हैं तब दलित और आदिवासी नेताओं, अधिकारियों की चुप्पी बहुत भयानक सच्चाई को उजागर करती है. ये चुप्पी सिर्फ दलित नेताओं, झंडाबरदारों और प्रशानिक अधिकारियों तक ही सीमित नहीं है बल्कि शूद्र (ओबीसी), दलित आदिवासी तबकों से आने वाले बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग भी इस स्थिति के सामने मौन और दुविधाग्रस्त होकर खड़ा है.
जाति नाश या जाति उन्मूलन की मूल भावना और लक्ष्य को अगर ठीक से देखा जाए तो आप पायेंगे कि एक अच्छे उद्देश्य से जो काम शुरू किया गया उसकी दिशा और उसकी कार्यपद्धति बहुत हद तक गलत रही है. ये वक्तव्य जाति उन्मूलन के अभी तक के देशव्यापी प्रयासों पर एक साझी टिप्पणी के रूप में समझा जा सकता है. इस वक्तव्य के कई पहलू हैं और ये वक्तव्य कई बिन्दुओं पर आधारित है.
हम शुरुआत करते हैं डॉ. अंबेडकर के जाति उन्मूलन के आह्वान से. उनका प्रसिद्ध भाषण “एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट” जो कि असल में सवर्णों को उनके धर्म की बुराई के बारे में जागरूक करते हुए लिखा गया था उसमे जाति व्यवस्था का और उसकी अनैतिकता और दरिन्दगी का विश्लेषण किया गया है. लेकिन इसमें बहुत स्पष्ट शब्दों में जाति उन्मूलन का कोई प्रेक्टिकल रोडमेप नहीं दिया गया है. हालाँकि वो भाषण हो भी नहीं पाया और हमें तत्कालीन सवर्ण हिन्दू मानस की प्रतिक्रिया भी इस पर नहीं मिल पायी. बाद में ये भाषण “एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट” के नाम से एक किताब के रूप में प्रकाशित हुआ. इस किताब का उद्देश्य सवर्ण हिन्दुओं को उनकी जाति व्यवस्था के प्रति जागरूक करना था ताकि वे अपनी बीमारी को पहचान सकें.
इस किताब के दूसरे संस्करण की भूमिका में भी डॉ. अंबेडकर ने इस किताब का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए लिखा था कि “अगर मैं हिंदुओं को यह समझा पाया कि वे भारत के बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी दूसरे भारतीय लोगों के स्वास्थ्य और उनकी खुशी के लिए खतरा है, तो मैं अपने काम से संतुष्ट हो पाऊंगा”. उसके बाद डॉ. अंबेडकर जाति उन्मूलन के अन्य संभव सामाजिक, राजनीतिक शैक्षणिक और यहाँ तक कि धर्म परिवर्तन संबंधी आयामों में भी प्रयोग और प्रवेश करते हैं. लेकिन इस सबका परिणाम क्या हुआ?
यह कहना पूरी तरह ठीक नहीं होगा कि इसका परिणाम नहीं हुआ है. वास्तव में इसका बहुत कुछ परिणाम हुआ है. दलितों आदिवासियों अल्पसंख्यकों की स्थिति में काफी सुधार हुआ है लेकिन गौर से देखा जाए तो जाति उन्मूलन नहीं हुआ है. दलितों दमितों की आर्थिक, शैक्षणिक स्थिति में सुधार अवश्य हुआ है लेकिन व्यापक रूप से देखें तो भारत की सामाजिक या धार्मिक जमीन पर उनके लिए स्थिति बिलकुल भी नहीं बदली है. इसका सीधा अर्थ ये है कि ऊपर-ऊपर कास्मेटिक बदलाव हुए हैं लेकिन गहराई में जाति का विभाजन – जाति अंतर्गत विवाह और भोजन की विवशता के रूप में – अभी भी वहीँ का वहीं बना हुआ है.
इसको और सरल शब्दों में कहें तो जाति के आधार पर विवाह और भोजन का प्रतिबन्ध अभी भी बना हुआ है जो बताता है कि जाति अभी भी पूरी तरह बनी हुई है. फिर इस केन्द्रीय तथ्य के बाकी सारे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सभ्यतागत परिणाम हैं जो हम सब रोज अखबारों में पढ़ते हैं. अखबार की ये खबरें बीमारी को दिखाती हैं लेकिन बीमारी के असल कारण – जाति और वर्ण के भेद की निरन्तरता को नहीं दिखाती है.
दो घटनाओं को उदाहरण की तरह लीजिये. पहला उदाहरण ये कि अभी किसानों की आत्महत्याओं से हम सब दुखी और चिंतित हैं. शायद भारत ने दुनिया में अनोखा वर्ल्ड रिकार्ड बनाया है जिसमे किसानों ने युद्ध या गृहयुद्ध या आर्थिक मंदी के न होने की दशा में भी इतनी बड़ी संख्या में आत्महत्याएं की हैं. इसका कुछ संबंध जाति और वर्ण की बहस से भी अवश्य जुड़ता है. जिस वर्ण या जाति के लोग किसान हैं या भूमिहीन मजदूर हैं उन जातियों वर्णों के लोगों का राजनीति और व्यापार जगत में ‘सक्रिय’ प्रतिनिधित्व कितना है? स्थानीय व्यापारियों के जगत में किस जाति या वर्ण का कब्जा है? मंडियों में अनाज के व्यापार पर और सब्जियों के बाजार में सदियों से किन जातियों और वर्ण का कब्जा है? बीज, खाद, कीटनाशकों की दुकानों और बैंकों तक में किन जातियों और वर्णों का वर्चस्व है?
फिर इन सबको नियंत्रित करने वाली शासन-प्रशासन या कानून की व्यवस्था की बागडोर किन जातियों और वर्णों के हाथ में है? इस सबके बाद अब ये देखिये कि किसानों मजदूरों की जातियों के सक्रिय प्रतिनिधि ऊपर वाले स्तरों पर कितने हैं? सरल शब्दों में कहें तो बात ये है कि किसान या मजदूर के मरने पर शेष ऊँची जाति के हिन्दुओं को “अपने रिश्तेदार या दोस्त के मरने” जैसा दुःख होता है क्या? किसान या मजदूर के कमजोर और अशिक्षित रह जाने पर ऊँची जाति के हिन्दुओं को “अपने रिश्तेदार या दोस्त के पिछड़ जाने” जैसा दुख होता है क्या? इसका उत्तर है – नहीं. उन्हें इस तरह का कोई दुःख नहीं होता.
उन्हें इन आत्महत्याओं से या इस पिछड़ेपन से न तो व्यक्तिगत दुःख होता है न ही उनकी राजनीति, अर्थसत्ता या सामाजिक सत्ता पर कोई खतरा नजर आता है इसीलिये वे इसे नजरअंदाज करके बड़ी आसानी से सदियों सदियों जहां के तहां बने रहते हैं.
दूसरा उदाहरण देखिये. सवर्ण हिन्दुओं को जब महसूस हुआ कि राम मन्दिर मुद्दे को वे अपनी राजनीतिक सत्ता मजबूत करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं तो उन्होंने देश भर में इसके लिए आन्दोलन छेड़ दिया. मन्दिर मस्जिद के होने या न होने से किसी गरीब हिन्दू या मुसलमान का कोई भला नहीं होता लेकिन चूँकि स्वर्ण हिन्दू राजनीति को इसकी जरूरत थी इसलिए उन्होंने देश की आंतरिक सुरक्षा और साम्प्रदायिक सौहार्द्र को नुक्सान पहुंचाते हुए भी ये काम किया. वे ऐसा कर सके क्योंकि समाज, व्यापार, शासन, प्रशासन, धर्म संस्कृति और मीडिया के हर स्तर पर उनके लोगों का दबदबा है. उनका अपना नेटवर्क और प्रेशर ग्रुप है जो देश और देश की गरीब जनता से ज्यादा अपने जातीय और वर्णगत नेटवर्क के प्रति अधिक वफादार है.
इसका सीधा अर्थ ये हुआ कि भारत की राजनीति और सामाजिक प्रक्रियाएं सवर्णों के आपसी सामाजिक संबंधों और समीकरणों से चलती हैं. उन प्रक्रियाओं में दलितों पिछड़ों के समाजों में उभर रहे सुख दुःख का कोई असर शामिल नहीं है. सवर्ण हिन्दू अपने लिए मंदिर बनवाने के लिये देश भर में आन्दोलन कर देंगे लेकिन किसानों की आत्महत्या के मुद्दे पर गरीब असहाय मजदूरों और किसानों की न्यूनतम आय सुनिश्चित करने के मुद्दे पर कुछ नहीं करेंगे. इससे ये सीख मिलती है कि अगर दलितों शूद्रों के आपसी जातीय समीकरण राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से एकदूसरे के निकट आकर एक हो जाएँ तो आप इस सवर्ण राजनीति या समाज को अपने अनुसार बदल सकते हैं. याद रखिये, दलित पिछड़ों के समाज में समाज के अलग अलग स्तरों में अगर आपसी मेलजोल नहीं है तो दलितों पिछड़ों की राजनीति इसी तरह बिकती रहेगी आपके दलित नेता सवर्णों की गोदी में बैठकर ऐसे ही पुरस्कार पाते रहेंगे.
कल्पना कीजिये कि भारत में शासन-प्रशासन में सर्वाधिक प्रतिनिधित्व रखने वाली जातियों के बच्चों में कोई बीमारी फैलती है और उनके जीवन पर संकट आता है. तब ये प्रतिनिधि क्या करेंगे? क्या ये अपने बच्चों को भी दलितों आदिवासियों अल्पसंख्यकों के बच्चों की तरह उपेक्षा से देखेंगे? या फिर ये अपने शासन प्रशासन की शक्ति और पहुँच का इस्तेमाल अपने बच्चों की बेहतरी और सेहत के लिए करेंगे? इसका जवाब आसान है. ये लोग पूरी ताकत लगाकर अपने बच्चों की सेहत और खुशहाली के लिए शासन प्रशासन से ऐसी नीतियाँ बनवायेंगे जो उनके हित में हों. उसे लागू करवाने का भी इन्तेजाम करेंगे. ऐसा कारनामा हमारे सांसद और विधायक अपनी अपनी तनख्वाह बढवाने के लिए कई बार कर चुके हैं.
इस काल्पनिक उदाहरण के बाद वास्तविकता में भारत की गरीब जातियों के बारे में सोचिये. उनके बारे में सोचने वाले और वास्तव में मुंह खोलने वाले इस राजनीति, शासन-प्रशासन में कितने हैं? और इससे भी बड़ी बात ये कि क्या इन लोगों को पता है कि वे अपने बच्चों के लिए क्या कर सकते हैं और भारत से जाति को खत्म करके न सिर्फ अपने लोगों को बल्कि स्वयं भारत की अस्सी प्रतिशत आबादी को सबल बना सकते हैं? इस प्रश्न का उत्तर है – नहीं. सरल शब्दों में कहें तो भारत की पिछड़ी जातियों को उनके प्रतिनिधियों और सक्षम लोगों को बहुत हद तक ये साफ़ साफ़ पता ही नहीं है कि वे अपने लोगों की और भारत की अस्सी प्रतिशत जनसंख्या (जो कि दलित और शूद्र/ओबीसी/आदिवासी/अल्पसंख्यक है ) की जिन्दगी को निर्णायक रूप से सुधारने के लिए क्या कर सकते हैं या उन्हें क्या करना चाहिए.
इस सवाल को दुसरे कोण से देखिये. क्या भारत के इन बहुसंख्य लोगों के कमजोर या बीमार होने से सवर्ण जातियों के सामाजिक सम्मान या राजनीतिक आर्थिक रुतबे में कोई खतरा पैदा होता है? इसका जवाब ये है कि भारत के बहुसंख्यक लोगों के कमजोर होने से उन सवर्णों को नुक्सान नहीं बल्कि फायदा होता है. तब वे अपनी राजनीति अपने धर्म और अपनी संस्कृति को, अपने भोजन या कपडे की पसंद को आपके ऊपर थोप सकते हैं. अभी आंख खोलकर देखिये, भारत में ये ही खेल चल रहा है. तब आप क्यों और कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि ये जातियां और वर्ण दलितों शूद्रों और आदिवासियों लिए बेहतर नीतियों या बेहतर राजनीति के निर्माण के लिए मेहनत करेंगी? और आप इनसे ये उम्मीद करते हैं तो आप स्वयं क्या करेंगे? क्या बैठकर इंतज़ार करेंगे? कब तक इन्तेजार करेंगे?
इस बात को गहराई से समझिये, राजनीति या प्रशासन में कुछ अच्छा करने की सदिच्छा के होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता, यह राजनीतिक संकल्प (पोलिटिकल विल) का विषय है. और राजनीतिक संकल्प असल में सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक लाबिंग का खेल है. हो सकता है कि सवर्ण जातियों में बहुत से संवेदनशील राजनेता, प्रशासक चिन्तक, लेखक कार्यकर्ता या सामान्य नागरिक हों. मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ ऐसे बहुत लोग हैं. और ये भी सच है कि दलितों पिछड़ों के हक की आवाज उठाने के लिए हजारों लाखों सवर्ण हिन्दूओ और ब्राह्मणों भी बहुत ईमानदारी से मेहनत कर रहे हैं, पहले भी उन्होंने भारत को सभ्य बनाने के लिए और जाति सहित अस्पृश्यता आदि के उन्मूलन के लिए बहुत कुछ किया है. लेकिन इसके बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते तो इसका इमानदार विश्लेषण करना होगा.
ऊपर के इस विस्तार में जाने के बाद आप देखेंगे कि जाति नाश आरंभ से एक ऐसा प्रयास रहा है जिसमे जाति व्यवस्था से पीड़ित लोगों की बजाय जाति व्यवस्था से फायदा उठाने वालों पर अधिक ध्यान दिया गया है. एक अर्थ में ये जरुरी भी था. दलितों पिछड़ों को ये बताना जरुरी था कि तुम्हारी दुर्दशा के लिए तुम नहीं बल्कि ये सामाजिक धार्मिक व्यवस्था जिम्मेदार है, ताकि वे हीन भावना से निकलकर कुछ करने को सक्षम हो सकें. साथ ही हिन्दुओं को उनके शास्त्रों और धर्म में छुपे कैंसर के बारे में भी बताना जरुरी था ताकि वे दुनिया की अन्य सभ्यताओं और धर्मों से अपनी तुलना कर सकें. ये काम न्यूटन या गेलिलियो के काम जैसा है.
कबीर रैदास फूले अंबेडकर पेरियार आदि ने ये काम पूरी उंचाई तक ले जाकर मुकम्मल कर दिया है. एक तरह से उन्होंने न्यूटन की तरह गुरुत्वाकर्ष्ण सिद्धांत खोजकर दे दिया है. अब हमे आइन्स्टीन या स्टीफेन हाकिंग की तरह आगे बढना है. आज भी हम अंबेडकर फूले पेरियार की तरह सिर्फ सवर्णों को संबोधित करते रहेंगे तो इसका मतलब है कि हम हर पीढी में न्यूटन की तरह ग्रेविटी की खोज करते रहेंगे. फिर हम ग्रेविटी के ज्ञान पर आधारित राकेट यान कब बनायेंगे? तब हम मार्टिन लूथर की तरह समाज और संस्कृति में पुनर्जागरण कब लायेंगे?
जाति व्यवस्था के लिए सवर्णों को संबोधित करने की बात हमारे लेखन, साहित्य, राजनीतिक सामाजिक बहस में और दस्तावेजों में डॉ. अंबेडकर के प्रसिद्ध भाषण – एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट – से ही चली आ रही है. डॉ. अंबेडकर ने सवर्णों की सभा के लिए ही इसे लिखा था और इस भाषण के पहले और बाद में भी अपने लोगों के लिए सवर्णों की सदिच्छा पर निर्भर न रहते हुए भी स्वयं की शक्ति में भरोसा रखते हुए कई महत्वपूर्ण काम किये हैं, लेकिन जाति विनाश के विमर्श और आन्दोलन के केंद्र में जाति से पीड़ित जातियों की बजाय लाभ पाने वाली जातियों को रखने की प्रवृत्ति अभी भी कम नहीं हुई है. इसका सरल भाषा में मतलब ये हुआ कि आज भी दलित पिछड़ों के बीच में आपसे बातचीत होती है तो सवर्ण द्विज हिन्दुओं की भूमिका पर अधिक चर्चा होती है स्वयं दलित पिछड़े अपने बीच जाति भेद कैसे गिरा सकते हैं इस बात पर बहुत कम चर्चा होती है.
दलितों पिछड़ों को समझना चाहिए कि समाज, राजनीती और शासन प्रशासन सहित व्यापार रोजगार आदि भी असल में सामाजिक आर्थिक संबंधों और राजनीतिक नेटवर्किंग या लॉबिंग से चलते हैं. ऊपर बताये उदाहरण में अगर सवर्ण प्रतिनिधि अपने बच्चों के इलाज के लिए या अपनी तनख्वाह बढाने के लिए शासन प्रशासन को मजबूर कर सकते हैं तो आपको भी यह सोचना है कि आप स्थानीय व्यापार, सामाजिक आर्थिक समीकरण, स्थानीय राजनीति, स्थानीय बाजार, स्थानीय या क्षेत्रीय या राष्ट्रीय स्तर की शैक्षणिक या वैचारिक बहस को अपनी जातियों और वर्ण की एकता से कैसे प्रभावित कर सकते हैं? ये सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है जो राजनीति से ज्यादा समाज की रोजमर्रा जिन्दगी पर लागू होता है. इस प्रश्न का जो उत्तर है उसके दो पहलु हैं:
१. पहला ये कि राजनीतिक या सामाजिक बदलाव लाबिंग या सामाजिक नेटवर्क के आपके हित में सक्रीय होने से होता है. ऐसा नेटवर्क बनाना और उसे आपके हित में सक्रीय करना आपकी यानि दलितों पिछड़ों अल्पसंख्यकों की जिम्मेदारी है. अगर इसके लिए आप सवर्ण द्विज हिन्दुओं का मुंह देखते हैं तो आप कार्यवाही और सोच विचार की कमान उनके हाथों में दे देते हैं फिर वे जैसे चाहें आपको घुमाते रहेंगे.
२. दूसरा ये कि अगर आप राजनीतिक सामाजिक नेटवर्क बनाने और सक्रिय करने में अपनी ही जातियों और वर्ण के लोगो को केंद्र में रखें सिर्फ उनसे ही उम्मीद करें और आपस में अपनी जातियों को पहले खत्म कर सकें तो जाति उन्मूलन के विमर्श और उसपर कार्यवाही की कमान आपके हाथ में होगी. तब स्वर्ण द्विज हिन्दू चाहकर भी आपको भटका नहीं सकेंगे. और तब वे आपके राजनीतिक नेतृत्व को खरीद भी नहीं पायेंगे.
अब मुद्दा ये है कि समाज और राजनीति में दलित पिछड़े अपना नेटवर्क और अपनी लाबी को कैसे मजबूत करेंगे?
इसके उत्तर के लिए हमें डॉ. अंबेडकर के वक्तव्य को ठीक से समझना पड़ेगा. जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है डॉ. अंबेडकर ने “एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट” किताब के दूसरे संस्करण की भूमिका में लिखा था कि “अगर मैं हिंदुओं को यह समझा पाया कि वे भारत के बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी दूसरे भारतीय लोगों के स्वास्थ्य और उनकी खुशी के लिए खतरा है, तो मैं अपने काम से संतुष्ट हो पाऊंगा”. इस वक्तव्य पर गौर कीजिये. यहाँ सवर्ण हिन्दुओं से उम्मीद की जा रही है कि वे जाति व्यवस्था के जहर को समझें और ये भी समझें कि उनकी ये बीमारी शेष भारत के लिए क्यों खतरनाक है.
बाद के दौर में हम देख पाते हैं कि सवर्ण हिन्दुओं को अपनी इस बीमारी की वजह से शेष भारत के नुकसान की कोई चिंता नहीं है. इसके विपरीत उन्हें इस बीमारी को बढाते जाने की चिंता अधिक है. अगर आप भारत में सामाजिक धार्मिक सांस्कृतिक संगठनों और प्रचलित बाबाओं कथाकारों और गुरुओं के कामों का विश्लेषण करें तो वे जाति व्यवस्था को खत्म करने के लिए कुछ भी नहीं कर रहे हैं बल्कि जिस पलायनवादी और पुनर्जन्मवादी अध्यात्म से जाति व्यवस्था को ताकत मिलती है, उसी अध्यात्म का पाठ पढाये जा रहे हैं. सवर्ण सांस्कृतिक संगठन हिंदुत्व की विभाजक राजनीति कर रहे हैं और दलितों शूद्रों मुसलमानों के शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास, स्वास्थय सुविधाओं सहित सामाजिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की संभावना को कमजोर बना रहे हैं, घोषित रूप से जाति आधारित आरक्षण को खत्म करना चाहते हैं और इससे भी आगे बढ़कर वे आरक्षण के मुद्दे पर दलितों शूद्रों आदिवासियों को आपस में लड़ा रहे हैं.
इन बातों का मतलब ये हुआ कि सवर्ण द्विज हिन्दू अभी भी जाति को अपनी बीमारी के रूप में या देश के लिए खतरे के रूप में नहीं देख पा रहे हैं या इस तरह देखना नहीं चाहते हैं. इसका कारण भी साफ़ है कि चूँकि उन्हें इस बीमारी को बनाये रखने से फायदा होता है इसलिए वे अपनी तरफ से इसे खत्म करने का कोई काम नहीं करेंगे. इसका साफ़ मतलब ये है कि डॉ. अंबेडकर हिन्दुओं को नहीं समझा पाए कि वे बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी देश के लिए खतरनाक है. थक हारकर उन्होंने दलितों को बौद्ध धर्म में जाने की सलाह दी थी. उनका ये कदम इस बात के लिए था कि सवर्णों से जाति नाश की उम्मीद करना बेकार है. इसकी बजाय दलितों पिछड़ों को स्वयं अन्धविश्वासी धर्म और परम्परा को छोड़कर, उससे बाहर निकलकर अपनी मदद खुद करनी चाहिए.
अब इस बिंदु पर आकर अब एक सबसे बड़ा सवाल उठता है कि स्वर्ण द्विज हिन्दुओं को छोडिये, क्या दलितों, शूद्रों आदिवासियों और मुसलमानों को ये बात समझ में आ गयी है कि “उनके अपने भीतर की जाति व्यवस्था उनके अपने लिए क्यों और किस तरह खतरनाक है?” ये सवाल अजीब लगेगा लेकिन यही असली सवाल है. और इसका उत्तर ये है कि दलितों पिछड़ों को पता ही नहीं है कि ये ‘उनकी अंदरूनी जाति व्यवस्था’ ही उनके लिए सबसे ज्यादा खतरनाक है. मेरे इस वक्तव्य पर बहुत लोगों को तकलीफ होगी या इसका मजाक उड़ाया जा सकता है. लेकिन हकीकत यही है कि दलित और पिछड़े समुदाय अपनी खुद की अलग अलग जातियों में विवाह और भोजन का प्रतिबन्ध नहीं तोड़ पाए हैं. अभी भी दलितों और आदिवासियों और शूद्रों में आपसी एकीकरण नहीं हो पाया है और इसी कारण इनके राजनीतिक और सामाजिक प्रेशर ग्रुप निकम्मे पड़े हैं.
कल्पना कीजिये कि किसानों कामगारों और मजदूरों की जातियों में आपस में एकीकरण हो जाए, ये सवर्णों से जाति नाश की उम्मीद लगाना छोड़कर खुद ही अपने बीच जाति नाश करके अपने बीच में विवाह और भोजन सहित अन्य सामाजिक आर्थिक व्यवहार शुरू कर दें तो क्या होगा? इससे ये होगा कि एक समाज के रूप में और एक राजनीतिक इकाई के रूप वे संगठित हो जायेंगे. एक जाति में दुसरी जाति की बेटी या बहु या रिश्तेदार होगा तो उन्हें उस जाति के गरीब या अमीर होने में दुःख या सुख का अनुभव होगा.
ऐसे में जब सभी जातियों के हित एकदूसरे से विवाह और भोजन सहित व्यापार रोजगार आदि के रास्ते से जुड़ जायेंगे तब दलितों पिछड़ों अल्पसंख्यकों के सामाजिक और राजनीतिक संगठन एक भारी संख्या (भारत की जनसंख्या का 70 प्रतिशत से भी अधिक) के जरिये अपने सपनों का समाज और भारत बना सकेंगे. तब तीस प्रतिशत या तीन प्रतिशत रसूखदारों को भी आपके लिए बदलना ही पड़ेगा. जब सवर्ण द्विज हिन्दू ये देखेंगे कि जाति व्यवस्था से ‘उन्हें’ उनकी राजनीति और उनके व्यापर को नुक्सान हो रहा है तब वे जाति उन्मूलन का प्रयास अपनी तरफ से इमानदारी से शुरू करेंगे.
मतलब ये हुआ कि सभी दलितों पिछड़ों अल्पसंख्यकों को अपनी अंदरूनी जाति व्यवस्था तोड़कर पूरे समाज को इस स्तर तक ले जाना है जहां सवर्णों को अपनी राजनीति, व्यापार, रोजगार आदि के मामले में जाति व्यवस्था से नफरत होने लगे. तभी वे कुछ करेंगे. और जब तक वे कुछ न करें तब तक हमें अपने भीतर जाति व्यवस्था को खत्म करना है.
अब इस लेख की शुरुआत में आये जार्ज बर्नार्ड शॉ के वक्तव्य पर लौटते हैं कि “भीड़ जिस दिशा में जा रही है उसी दिशा में झंडा लेकर आगे हो लेने वाला नेता होता है” ये वक्तव्य असल में राजनीतिक नेतृत्व और राजनीतिक अवसरवादिता को व्यक्त करता है. साथ ही बर्नार्ड शॉ का ये मजाक असल में जनता की असली ताकत को भी उजागर करता है. जनता (हमारे लिए भारत की गरीब जातियां) अगर अपनी मर्जी से कोई एक दिशा चुन कर उसपर निकल पड़े तो सारे नेता उसी दिशा में झंडा लेकर दौड़ पड़ने के लिए मजबूर हो जायेंगे.
इस बात को आप अभी भी होता हुआ देख सकते हैं. जिन लोगों ने गाय या मन्दिर या राष्ट्रवाद के इर्दगिर्द राजनीति खडी की है उन्होंने ये काम राजनीति में सीधे सीधे नहीं किया है बल्कि धीमे जहरीले धार्मिक प्रचार और शिक्षा, धार्मिक प्रवचनों, गुरुओं, पंडितों, पुजारियों, धार्मिक सीरियल्स, कार्टून, फिल्मों आदि के माध्यम से भीड़ को धर्म, मन्दिर, गौरक्षा और राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाया है. अब जब भीड़ उन जहरीले प्रचार और शिक्षा को मानकर एक दिशा में निकल पड़ी तब उनकी “बी टीम” के राजनेता झंडा लेकर आगे हो गये हैं और भारत की राजनीति और संसद में ताकतवर होकर नजर आने लगे हैं.
भीड़ के इस चुनाव के तर्क को आगे बढायें तो हमें देखना होगा कि दलित और पिछडे क्या सीखकर किस दिशा में दौड़ रहे हैं? आप गहराई से देखें तो उन्होंने इन सवर्ण धार्मिक बाबाओं, गुरुओं, पंडितों, पुजारियों सहित उनके धर्म और देवी देवताओं से ही शिक्षा ली है और उस शिक्षा पर खड़ी जाति व्यवस्था और धर्म को अपनी ही अंदरूनी जातियों को मजबूत बनाने में इस्तेमाल किया है. जब सवर्ण नेता या किसी भी जाति वर्ण के नेता ये देखते हैं कि दलित या पिछड़े खुद ही जाति व्यवस्था और इस व्यवस्था को सिखाने वाले अन्धविश्वासी धर्म को ही मजबूत करने में लगे हुए हैं तो वे भी झंडा उठाकर उसी दिशा में दौड़ पड़ते हैं.
इसमें उनकी गलती कम है दलितों पिछड़ों की गलती अधिक है. ऐसे में जाति व्यवस्था को खत्म करने वाला सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व उभर ही नहीं सकता. ऐसे में किसी भी राजनीतिक पार्टी के घोषणापत्र में जाति उन्मूलन एक एजेंडे की तरह शामिल नहीं हो सकता. ऐसे में जाति उन्मूलन का वादा चुनाव में जीत का आश्वासन नहीं बन सकता.
ये दलितों पिछड़ों की बड़ी आबादी के लिए बड़ी शर्म की बात है कि मंदिर या मस्जिद की लड़ाई या “मन्दिर वहीं बनायेंगे” जैसी बातें चुनाव में जीतने के लिए आश्वासन बन जाती हैं और “जाति सभी मिटायेंगे” जैसे नारों की कल्पना तक राजनीतिक घोषणापत्र या राजनीतिक रणनीति से नहीं जुड़ पाई है. इसका ये मतलब है कि बीमारी या कमजोरी राजनीति में नहीं है बल्कि दलितों पिछड़ों की भीड़ में ही कहीं असली बीमारी छुपी हुई है. वे खुद अपनी राजनीतिक प्रतिनिधियों को ये सन्देश साफ ढंग से नहीं दे पाए हैं कि उन्हें जाति और जातिवादी धर्म को कमजोर करना पसंद है या इन्हें मजबूत करना पसंद है.
जब राजनीतिक नेता दलितों पिछड़ों को सवर्ण हिन्दुओं के मन्दिरों में पंडालों में कथाओं और जगरातों में कीर्तन करता हुआ देखते हैं, पुनर्जन्म और आत्मा परमात्मा की शिक्षा से प्रभावित होता हुआ देखते हैं, लगन महूरत और ज्योतिष में भरोसा करता हुआ देखते हैं तो वे समझ जाते हैं कि ये भीड़ जाति नाश की दिशा में नहीं बल्कि जाति को और जातिवादी धर्म को मजबूत करने की दिशा में जा रही है. तब वे भी अपनी अवसरवादी फितरत के साथ उसी दिशा में झंडा लेकर दौड़ पड़ते हैं और नारा लगाने लगते हैं. अगर दलितों पिछड़ों की भीड़ अपमानित किये जाने पर भी बार बार उसी मन्दिर में जाती है तो वे नेता नारा लगाते हैं कि ‘मंदिर वहीं बनायेंगे’. अगर दलितों पिछड़ों की भीड़ आपसी जातियां मिटाने लगें तो कल को ये ही नेता नारा लगायेंगे कि “जाति सभी मिटायेंगे”. आपके नेता क्या करेंगे क्या नारा लगायेंगे ये आपको आपकी भीड़ को और आपके समुदायों को आपस में मिलकर तय करना है.
अब इस सब से करने योग्य क्या हासिल हुआ?
इसका सीधा मतलब यही निकलता है कि आपको जाति के नाश के लिए दूसरों से उम्मीद नहीं रखनी है. दलितों पिछड़ों को सवर्णों से उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि वे आकर उनका धार्मिक अंधविश्वास और उस पर आधारित जाति को मिटा दें. इसके विपरीत दलितों पिछड़ों को आपस में मिलजुलकर अपनी-अपनी जातियों में विवाह, भोजन और सामाजिक, आर्थिक व्यवहार के अन्य रिश्ते बनाने होंगे. और इससे भी बढ़कर एक काम और करना होगा. जो धर्म या अन्धविश्वास जाति व्यवस्था को मजबूत करता है. जो धर्म या शास्त्र या गुरु या बाबा आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की शिक्षा देता है उससे दूरी बनाइए. उनकी शिक्षाओं में ही असली दुर्भाग्य छुपा हुआ है, जाति व्यवस्था की जड़ इसी धार्मिक शिक्षा में और इस पर आधारित पलायनवादी अध्यात्म में छुपी हुई है. अगर इस शिक्षा को दलित और पिछड़े नकार दें तो भारत भी सभ्य और समर्थ हो सकता है.
ऐसे नकार के लिए दलितों पिछड़ों को अतिवादी नहीं बनना है, न कोई सेना या हिंसक आन्दोलन खड़ा करना है, न तो हिन्दू धर्म को अब अपमानित करना है न उनके देवी देवताओं शास्त्रों का उपहास करना है ये सवर्ण हिन्दुओं का उनका अपना धर्म है वे जिस तरह उसे मानते हैं उन्हें मानने पूजने का संवैधानिक अधिकार उनके पास है. वे दलितों शूद्रों स्त्रीयों को अपने मंदिरों शास्त्रों के लिए अपवित्र या नीच समझते हैं तो दलितों शूद्रों को उन मन्दिरों शास्त्रों के निकट जाकर उन्हें दुखी नही करना चाहिए, ये शिष्टाचार की बात है.
इसकी बजाय दलितों पिछड़ों को पने मूल श्रमण धर्म ‘बौद्ध धर्म’ का अभी से पालन करना शुरू कर देना चाहिए. इसके लिए धर्म परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं है.
आपको सिर्फ आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म जैसी काल्पनिक और अन्धविश्वासी बातों में विश्वास करना बंद करना है और भारत के संविधान के अनुरूप वैज्ञानिक चित्त का अपने भीतर और अपने परिवार रिश्तेदारों मित्रों में विकास करना है. अपने बच्चों और स्त्रीयों मित्रों रिश्तेदारों आदि को को काल्पनिक मिथकों, देवी-देवताओं, भूत-प्रेत, या पितरों आदि के पूजा पाठ आदि से दूर कर लेना है. किसी अंधविश्वास की गुलामी हो या उसका मजाक बनाना हो दोनों एक तरह की अति है.
कोई भी अति समाज के लिए ठीक नहीं होती. इनके बीच में मध्यम मार्ग और संतुलित मार्ग ये है कि आप अपने भीतर की जाति व्यवस्था खत्म करें और अंधविश्वास से दूरी बना लें और वैज्ञानिक और नैतिक लोकतांत्रिक चेतना का विकास करते रहें. यही दलितों पिछड़ों और भारत को सक्षम और समृद्ध बनाने का रास्ता है.

डार्विनवाद को निगलने का अवतारवादी मायाजाल

चार्ल्स डार्विन का आज जन्मदिन है. डार्विन ने इंसानियत को एक वैज्ञानिक समझ देने की दिशा में जो योगदान दिया है वह अद्वितीय है. डार्विन ने जिस तरह से दर्शन और धर्म दर्शन को एक करारा धक्का दिया उससे यूरोप में एक नया युग शुरू हुआ. ऐसे अन्य वैज्ञानिक या विचारक बहुत ही कम हैं जिनकी तुलना डार्विन से की जा सके. न्यूटन, गेलिलियो, रदरफोर्ड या आइन्स्टीन जैसे वैज्ञानिकों ने जिस तरह से मनुष्यता को प्रभावित किया है उनकी तुलना में भी डार्विन का योगदान मौलिक रूप से भिन्न और गहरा है.
भौतिकी, गणित, खगोल, रसायन, चिकित्सा या भेषज इत्यादि में जो भी नयी प्रस्तावनाएँ आयीं उनसे तकनीक को पैदा करने में बहुत मदद मिली है. लेकिन डार्विन की खोज ने जीव विज्ञान में जिस गुत्थी को सुलझाया है उससे दर्शन और धर्म दर्शन को बड़ा धक्का लगा है और उसी के परिणाम में एक नया वैचारिक युग शुरू हुआ है.
मार्क्स और एंगेल्स अपनी स्थापनाओं के लिए जिस वैज्ञानिक प्रष्ठभूमि और प्रमाण को खोज रहे थे वह डार्विन ने उन्हें उपलब्ध करा दी. मार्क्स और मार्क्सवादियों ने डार्विन की खोज को बहुत मूल्य दिया है और एक ठोस जीव वैज्ञानिक खोज को दर्शन और विश्वव्यवस्था बदलने के लिए इस्तेमाल किया है. यूरोप में डार्विनवाद ने बहुत कुछ बदल दिया और फिर यूरोप ने एशिया को बदला. इस तरह एशिया और शेष गैर यूरोपीय जगत ने उपनिवेशों के रूप में डार्विन को समझना शुरू किया. दक्षिण एशिया में भी डार्विन का विरोध हुआ और डिवाइन क्रियेशन की थ्योरी पर आधारित धर्मसत्ता और राजसत्ता ने इसका खूब विरोध किया.
लेकिन बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि सनातनी वेदान्तिक बाबाओं ने डार्विन को भी चबाकर निगलने की भरसक कोशिश की है.
न केवल बुद्ध या कबीर का यहाँ ब्राह्मणीकरण हुआ है बल्कि डार्विन के सिद्धांत को भी वेद वेदान्त और पुराणों में दिखाने का प्रयास हुआ है. आजादी के पहले भारत में नियो वेदान्त और नियो हिन्दुइज्म के जनक स्वामी विवेकानन्द और थियोसोफिकल सोसाइटी ने भारतीय पुराणों में बतलाये गये अवतार और अवतारों के क्रम को डार्विन के क्रम विकास (एवोल्यूशन) की भारतीय खोज की तरह प्रचारित किया.
उन्होंने यह प्रचारित किया कि मत्स्यावतार से लेकर कल्कि अवतार तक की भारतीय पौराणिक मान्यता असल में डार्विन के क्रमविकास की तरह का कोई प्राचीन भारतीय सिद्धांत है. इस बात को एक अन्य भारतीय नियो वेदान्तिक बाबा – अरबिंदो घोष ने दोहराया. बाद में एक अन्य वेदांती ओशो रजनीश ने भी इसी बात को कई जगह दोहराया है और आजकल जग्गी वासुदेव भी इसी भाषा में अवतारवाद को डार्विनवाद से प्राचीन और एवोल्यूशन की भारतीय थ्योरी के रूप में दिखाने का प्रयास करते हैं.
इस प्रचार को गंभीरता से नहीं लिया गया है. यह आश्चर्यजनक बात है. पूरे यूरोप को हिलाकर रख देने वाले डार्विनवाद को भारतीय वेदान्तिक अवतारवाद ने जिस तरह से निगलने का प्रयास किया है वह कोई छोटी मोटी बात नहीं है. इस केस स्टडी को कभी उसके तार्किक विस्तार में सामने नहीं लाया गया.
अरबिंदो घोष ने फ्रेडरिक नीत्शे की “विल टू पावर”, “सुपरमेन” और डार्विन के “एवोल्यूशन” की खिचड़ी बनाकर जिस अतिमानस का सिद्धांत दिया वह हालाँकि ज्यादा टिक न सका लेकिन वेदान्तिक पाखण्ड किस तरह ज्ञान की राजनीति को राजनीति के ज्ञान से चलाता है इसकी बहुत अच्छी केस स्टडी तैयार कर दी. आज भी अरबिंदो घोष के अतिमानस को नजदीक से देखें तो उसमे नीत्शे और डार्विन साफ़ नजर आते हैं.
लेकिन विवेकानन्द, थियोसोफी, अरबिंदो, ओशो या जग्गी वासुदेव जिस तरह डार्विनवाद को अवतारवाद में प्रक्षेपित करते हैं उसका गहरा अर्थ समझा जाना चाहिए. गौतम बुद्ध और कबीर की क्रान्ति को जैसे उन्हें अवतारवाद और ब्राह्मणवाद में दबाकर खत्म किया गया उसी तरह का खेल डार्विन के साथ भी खेला गया है.
हालाँकि यह बात अलग है कि भारत सहित शेष दक्षिण एशिया इतना आलसी और अनपढ़ निकला कि उस पर डार्विन का वैसा असर नहीं हुआ जैसा यूरोप में हुआ. एक अन्य कारण उपनिवेशी दासता की भी है. खैर, इस सबके बावजूद नियो वेदान्त या नियो हिन्दुइज्म ने डार्विन के क्रमविकासवाद को अवतारवाद में प्रक्षेपित करने का अपना इन्तेजाम कर लिया था ताकि भारत में डार्विनवाद और मार्क्सवाद की आग को घुसने से रोका जा सके.
लेकिन क्या हम इस बात को दुबारा सामने लाकर भारत की सनातन वेदान्तिक षड्यंत्र बुद्धि को बेनकाब कर सकते हैं? डार्विन ही नहीं आइन्स्टीन की सापेक्षिकता और नील्स बोर के क्वांटम फिजिक्स को भी आजकल वेद वेदान्त में दिखाया जा रहा है. ब्लेक होल, बिग बैंग और क्वांटम इंटेगल्मेंट सहित टेलीपोर्टेशन को भी रहस्यवाद में जाने किन किन व्याख्याओं में घुमा फिराकर घुसेड़ा जा रहा है.
एक अन्य वेदांती बाबा दीपक चोपड़ा तो खुले आम क्वांटम हीलिंग करते ही हैं और इसके लिए रिचर्ड डाकिंस ने उनकी खूब खिंचाई भी की है लेकिन फिर भी यह सब बंद नहीं होता.
यह सब जानना क्यों जरुरी है? इसलिए कि इस सबसे हम यह जान सकेंगे कि भारत असल में वेदान्तिक षड्यंत्रों में इतनी बुरी तरह से फंसाया गया है कि दुनिया का कोई भी विचार हो कितनी भी क्रांतिकारी प्रस्तावना क्यों न हो उसे भारतीय बाबा किसी न किसी तरह बर्बाद करना जान गये हैं.
इसलिए बहुत गौर से देखा जाए तो भारत की गहनतम समस्या वेदान्त ही है. अवतारवाद और आत्मा परमात्मा पुनर्जन्म के अन्य अंधविश्वास इसी जहरीले क़ुवें से निकलते हैं.
डार्विनवाद को अवतारवाद द्वारा निगलने की इस असफल योजना को चर्चा में लाना जरुरी है. कम से कम इस देश के शोषितों को इसपर ध्यान देना चाहिए ताकि वे यूरोपीय पुनर्जागरण के प्रकाश को भारत तक न पहुँचने देने के वेदान्तिक षड्यंत्रों को समझ सकें.
(लिखी जा रही शीघ्र प्रकाश्य किताब का एक अंश)

नायकपूजा और देशसेवा

बाबासाहब डॉ.भीमराव आंबेडकर द्वारा दिया गया ‘रानडे, गाँधी और जीना ’ यह विश्वप्रसिध्द भाषण अनेक मायनों में आज भी प्रासंगिक है. आज भारतीय परिपेक्ष में हर क्षेत्र में व्याप्त जो नायक पूजा दिखाई देती है उसके तारतम्य में इस भाषण का परिपाठ आज पुनः एकबार आवश्यक है.
नायकपूजा और देशसेवा भिन्न :
प्रचलित दौर में इलेक्ट्रॉनिक एवं सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति के विचार एवं कृतियों पर अपनी छाप छोड़ी हुई है. परिस्थिति तो यहाँ तक पहुँच चुकी है कि लोगों को आज मनन या चिंतन करने कि भी आवश्यकता न पड़े. लोगों के विचार भी मीडिया द्वारा संचालित होते दिखाई दे रहे है. मीडिया की इस व्याप्ति के कारण नायकपूजा भारतीय जनमानस का एक अभिन्न अंग बनकर रह गयी है. मिसाल के तौर पर यह नायकपूजा नरेन्द्र मोदीजी के रूप में जैसे राजनीती में दृष्टिगत है वैसेही खेल जगत में सचिन तेंदुलकर के रूप में देखी जा सकती है. जैसे फिल्मों में अमिताभ बच्चन की नायकपूजा होती है वैसेही अन्ना हजारे का लिबास पहने वह  झूठमूठ की समाजनीति में भी दिखाई देती है. ऐसी नायकपूजा को आड़े हाथों लेते हुए डॉ. आंबेडकर ने भारतीय मानसिकता को उजागर कर उससे होनेवाले संभावित खतरों से भारतीय जनता को आगाह करते हुए कहा था, “मै आशा करता हूँ कि व्यक्ति से ऊपर देश होता है, यह बात मेरे भारतीय बंधुओं को एक न एक दिन समझ में आ जाएगी क्यूंकि देशसेवा और गाँधी एवं जीना की पूजा यह दोनों बाते भिन्न है.”
महामानव कौन कहलाता है :
सिकंदर, अत्तिला, सीज़र, तैमुरलंग जैसे अनेक योध्दाओं को उल्लेखित कर डॉ. आंबेडकर यह बताते है की ऐसे पुरुषों का दीर्घकालीन प्रभाव बहुत ही कम मात्रा में परिलक्षित होता है. क्यूंकि सामाजिक पुनर्रचना करने या उसमे नई चेतना प्रवाहित करने हेतु ऐसे पुरुष किसी  भी रसायन का निर्माण नहीं करते.
महामानवों को पहचानने हेतु कुछ कसौटिया डॉ. आंबेडकर उध्दृत करते है जैसे कि सत्यनिष्ठा, उच्च नैतिक एवं बौध्दिक गुण. इन सभी कसौटियों की चर्चा करते हुए बाबासाहब हमारा ध्यान एक महत्वपूर्ण प्रश्न की और खिंच लेते है वो प्रश्न है, महान(Great)व्यक्ति और प्रसिध्द (Eminent) व्यक्ति में क्या अंतर है? इस प्रश्न पर गहन विमर्श उपरांत बाबासाहब उत्तर देते है कि जो व्यक्ति प्रत्यक्ष कृति कर  समाज परिवर्तन का कार्य करता हो या उसके लिए लोगों को प्रेरित करता हो केवल वो ही व्यक्ति महान कहलाता है.
गुरुशिष्य परंपरा पर भाष्य:
बाबासाहब कहते है कि महान व्यक्ति  कभी भी स्वयं के विचार या निर्णय औरों पर थोपता नहीं तथा अपने अनुयायियों को बुध्दिभ्रष्ट कर अपना कार्य नहीं करता. अपितु, महान व्यक्ति हमेशा अपने अनुयायियों को स्फूर्ति प्रदान कर उन्हें जागृत करता है. उनमे नई उर्जा का संचारण कर उनमे छिपी हुई प्रतिभा को निखारता है. आगे बाबासाहब प्रतिपादन करते है कि गुरु के विचार या निर्णय शिष्यों पर बंधनकारक होना यह बात गुरु एवं शिष्य दोनों के हित के दृष्टिकोण से गलत है.
वर्तमान भारत अनेक समस्याओं से ग्रसित है. विषमतामूलक समाज का समर्थन करनेवाली विचारधारा आज सत्तासीन है. वैश्विकीकरण से उपजी समस्याएं, सामन्तवाद, बेरोजगारी, आर्थिक विषमता,संस्थात्मक शोषण एवं सस्थात्मक हिंसा, चरमपंथियों द्वारा किया जा रहा उन्माद, आदि समस्याओं से पूरा देश  व्याप्त है. समाज सुधारकों के साथ लोग खड़े न होकर राजनीती करने वालों के पीछे भीड़ बनाये फिरते है. बाबासाहब का भीड़ वाला यह निरिक्षण आज भी हम तृप्ति देसाई या कन्हैया कुमार के उदहारण से समझ सकते है.
बाबासाहब द्वारा दिया गया ‘रानडे, गाँधी और जीना’ यह भाषण अनेक अर्थों से आज भी प्रासंगिक है. वर्तमान परिस्थिति का सही आकलन करने एवं भविष्य में सही दिशा में मार्गक्रमण करने हेतु यह भाषण एक पथदर्शक के रूप में हर संवेदनशील व्यक्ति द्वारा पढ़ा जाना आवश्यक है.

दूरगामी असफलता का कारण

अभी भारत की राजनीति में जितने प्रयोग हो रहे हैं वे सब एक बड़े विस्तार में बहुत सारी संभवनाओं को खोल रहे हैं। कांग्रेस और बीजेपी की राजनीति से मोहभंग हो रहा है और नए मोह निर्मित हो रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण है AAP की सफलता जो एक शिक्षित और शहरी मध्यम वर्ग को अचानक सम्मोहित करके उभरी है। AAP असल में एक ऐसे शून्य को भरना चाहती है जिसकी निर्मिती के पूरे समाजशास्त्र और राजनीति से उसको खुद ही कोई गंभीर सरोकार नहीं है.
भ्रष्टाचार और स्वराज आदि इतने कामन और वेग से मुद्दे हैं कि इनको लेकर खडा हो जाना और वादे या दावे करना सबको पसंद आएगा. लेकिन असल मुद्दा ये है कि भ्रष्टाचार या स्वराज कि हीनता का वृहद् समाजशात्र और राजनीति क्या है? और इन्हें कैसे एड्रेस किया जाए. AAP के पास दूर दूर तक इसको लेकर कोई प्रपोजल नहीं है.
इसीलिये इनकी सैद्धांतिकी को चुनौती नहीं मिल रही, सैद्धांतिकी है ही नहीं तो चुनौती किसे देंगे? यही AAP की तात्कालिक सफलता का और दूरगामी असफलता का कारण है…. बाकी दलित और वाम राजनीति की सैधान्तिकी, समाजशास्त्र, राजनीति और अर्थशास्त्र बहुत ठोस आधारों पर निर्मित हो रहा है. इसीलिये बहस में उलझने की या उलझे ही रह जाने की संभावना भी है. यही इनकी तात्कालिक कमजोरी और दीर्घकालिक ताकत है.
आजकल की सभी राजनीतियां राइट बेस्ड अप्रोच से प्रभावित हैं। यह प्रभाव बढ़ता जाएगा। अब धर्म, जाती, समुदाय विशेष से होने के नाते जो अधिकार हैं उन अधिकारों को मुद्दा बनाया जाएगा। अब इस तरह ठीक से देखें तो ‘राईट बेस्‍ड सामाजिक नीतियों के आधार पर संगठित राजनीति’ में राईट का असल अर्थ निकालें तो वह राईट या अधिकार मजदूर और दलित सहित स्त्री के एक नागरिक होने के नाते अधिकार ही हैं, लेकिन नागरिक की अमूर्त और सपाट परिभाषा में भारतीय समाजों के बाशिंदे फिट नहीं बैठते। वे नागरिक होने से पहले और बाद में बहुत कुछ और भी होते हैं। और ये बहुत कुछ उस नागरिक पर भारी पड़ता है।
इसीलिये नागरिकवाद पर और दलितवाद, मजदूरवाद और स्त्रीवाद आदि की सैद्धांतिकी हावी होगी। ये अलग बात है कि इन वादों को शुद्धतम राजनीतिक टूल में बदल देने के प्रपोजल अभी तक सही मायने में आ नहीं सके हैं। लेकिन अब अंबेडकरी राजनीति बहुत नई परिभाषाओं और टूल्स के साथ आ रही हैं जिससे बड़ी उम्मीद जग रही है।
यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि राइट को AAP जिस ढंग से परिभाषित कर रही है वह एक परिभाषा है, अंबेडकरवाद जिस परिभाषा को लेकर चल रहा है वह दूसरी है। पहली परिभाषा आधुनिक लोकतंत्र में नागरिक होने की धारणा से आरंभ होकर उसी तक सीमित हो जाती है। अंबेडकरी परिभाषा शूद्र या अंत्यज या हिन्दू होने की धारणा से शुरू होकर आधुनिक लोकतान्त्रिक नागरिकता तक आती है और समानता स्वतंत्रता और बंधुत्व तक जाती है।
मार्क्सवादी या वाम की राजनीति अतीत से मजदूर और किसान से शुरू करके वर्तमान नागरिक तक आती है और एक सुपरिभाषित सर्वहारा की तानाशाही तक जाती है।
इस प्रकार अंबेडकरी और मार्क्सवादी राजनीति के पास जो परिभाषा है उसके पास अपना विस्तीर्ण अतीत है जिसका अपना समाजशास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र और दर्शन भी है।
AAP के पास सिर्फ वर्तमान है जिसमें अतीत की ठोस जड़ नहीं है इसीलिये उसके द्वारा निर्मित होने वाला भविष्य स्वतंत्र और सुरक्षित नहीं रह पाएगा। उस भविष्य पर विराट अतीत और समाजदर्शन वाली विचारधाराएं हावी होंगी। अभी AAP को जो सफलता मिल रही है वह विकल्पहीनता के शून्य में एक तिनका विकल्प होने के नाते मिल रही है। यह AAP की प्रशंसा भी है और आलोचना भी है।
अंबेडकरी राजनीति या दलित बहुजन राजनीति की ताकत अब जिस तरह बढ़ रही है वह एक भयानक सच्चाई है। अब बीजेपी आरएसएस को भी राइट बेस्ड ढंग में “हिन्दू” होने के नाते “अधिकार” की बात उठानी पड़ रही है। जैसे दलित आदिवासी स्त्री और मुस्लिम विक्टिम रहे हैं और दिखाये गये हैं उसी तरह अब ‘हिन्दू और हिंदुत्व’ को विक्टिम बनाकर और बताकर उसके अधिकारों को रेखांकित किया जायेगा।
लेकिन आरएसएस का सनातन दुर्भाग्य ये है कि हिन्दू जैसी सामाजिक, राजनितिक, धार्मिक इकाई न तो कभी थी न हो सकेगी। हिन्दू और हिंदुत्व एक परजीवी अमरबेल है जो दूसरी असुरक्षित अपरिभाषित इकाइयों के खून पर पलती आई है।
इसलिए हिन्दू या हिंदुत्व का अस्तित्व शेष सुपरिभाषित इकाइयों के नष्ट होने पर या आपस में दुश्मन बने रहने की संभावना पर टिका हुआ है। अब कोढ़ में खाज ये कि अब राजनितिक रूप से हिंदुत्व और हिन्दू की आइडेंटिटी से ज्यादा SC, ST या ओबीसी की आइडेंटिटी तेजी से हावी हो रही है, यही बीजेपी आरएसएस का सबसे बड़ा सरदर्द है।
इस सारे संक्रमण और अनिश्चय ने जो शून्य और असमंजस रचा है उसमें तात्कालिक मुद्दों की टीस भी अच्छा प्ले कर रही है और भ्रष्टाचार जैसे गैर महत्वपूर्ण मुद्दे भी राजनितिक परिवर्तन का या लामबंदी का बहाना बन सके हैं। लेकिन ये एक बार हो चुका। अब AAP की इस सफलता के दोहराने की संभावना कम है।
बीजेपी आरएसएस या कोंग्रेस की असफलता की पृष्ठभूमि न हो तो AAP का चमत्कार खो जायेगा। यह एक गंभीर बात है। यह AAP को दूसरों की असफलता पर पलने वाला परजीवी ही बनाती है। AAP के पास उसका अपना कोई विधायक और विशिष्ट सामाजिक सांस्कृतिक प्रपोजल नहीं है यह एक बड़ी कमजोरी है। खासकर आज के दौर में जबकि दक्षिणपंथ तेजी से विश्वभर में हावी ही रहा है, ऐसे में सँस्कृति और समाज के विमर्श में AAP की असमर्थता, तटस्थता या मौन भारी पड़ेगा। हालाँकि अभी तक यह मौन उसकी ताकत रहा है।
इसके उलट अंबेडकरी राजनीति इन मुद्दों पर हमेशा मुखर रही है। अंबेडकरी राजनीती एक सुविश्लेषित और लंबे अतीत से शुरू करके ठोस भविष्य को लेकर चलती है इसलिए उसका दायरा धीरे-धीरे ही सही लेकिन निर्णायक रूप से बढ़ रहा है।